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Tuesday, 5 January 2021

उतार-चढ़ाव की दौड़

माता-पिता के लिए सबसे खुशी का पल वह होता है जब बच्चा अपने पैरों पर खड़ा हो जाये। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है वैसे ही उम्मीद का चिराग जलने लगता है। लेकिन जब कभी उस बच्चे को गहरी चोट लग जाए तो भविष्य निराशा से घिर जाता है। ठीक ऐसी ही स्थिति आज भारत के अर्थव्यवस्था की है।


उस अर्थव्यवस्था कि जो धीरे-धीरे करके आगे बढ़ रहा था। जिसनें कभी पीछे मुड़ना नहीं सिखा, इसलिए तो भारत विकासशील देशों में शामिल है। लेकिन कोरोना के आने से कई सैक्टरों को खासा नुकसान हुआ है।

आज की स्थिति देखती हूं तो इतिहास का एक महत्वपूर्ण चित्र सामने आता है जब भारत को सोने की चिड़िया कह जाता था लेकिन पहले मुगल और फिर अंग्रेजों ने भारत की अर्थव्यवस्था को खोखला किया। हालांकि भारत में गरीबी, भूखमरी, अशिक्षा और स्वास्थ्य से सम्बन्धी समस्याएं रही है लेकिन बीते सालों में इनका भी दर कम मापा गया है। 

इतिहास का एक अभिन्न अंग यह भी है जब भारत में 50% से अधिक कृषि की जाती थी। औद्योगीकरण से लेकर कई सैक्टरों में सेवा, सभी में भारत आगे रहा है। खासकर आईटी सैक्टर के आने से भारत की विश्व बाज़ार में विशेष पहचान बनी है।

दूसरी ओर सन् 1947 से 2020 तक की बात करें तो भारत को 3 बार आर्थिक मन्दी का सामना करना पड़ा। पहला 1991 में, जब अर्थव्यवस्था को काफ़ी नुकसान हुआ था। जिसका मुख्य कारण पेमेंट क्रसिस, इम्पोर्ट में कमी और व्यापार में संतुलन का बिगड़ना था। दूसरी बार अर्थव्यवस्था की लाठी भारत पर ज्यादा जोर से नहीं पड़ी और खुद को एक साल के भीतर निकल लिया। ये बात 2008 की है जब पूरे विश्व को मन्दी का सामना करना पड़ा। तीसरा अब जब कोरोनावायरस की मार सबको झेलनी पड़ी।

देखा जाए तो कोरोना के आने से सभी वर्ग के लोगों को नुकसान हुआ है। बस अन्तर कम-ज्यादा का है। किसी के पास रोटी नहीं तो कोई बीमार है। हाँ, इस वक़्त ने लगभग सभी को महीने खाली बैठाया है। बस अन्तर इतना है कि किसी को तनखाह मिली है और किसी को नहीं। स्कूल-कॉलेज सब बन्द हो गये है। यहाँ तक की लोग डिप्रेशन में जा रहे है।

अर्थव्यवस्था की केवल बात करू तो जीडीपी 4•5% से बढ़के 4•7% हुई थी लेकिन कोरोना के आने 2020 की नोमिनल जीडीपी के लक्ष्य को पूरा कर पाना बहुत मुश्किल है। हालांकि भविष्य में भारत दूसरे देशों के मुताबिक़ खुद को जल्द ही वापस बढ़त की ओर ले जायेगा। किसका कारण यह है कि भारत उपभोग आधारित अर्थव्यवस्था है। जिसकी वजह से भारत को आयात को नियंत्रण कर सकता है। साथ ही लोकल प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल कर खुद को सशक्त कर सकता है।

इस समय भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए "वोचल फ़ॉर लोकल" नाम से सरकार द्वारा अभियान चलाया जा रहा है। जो आज एक अहम कड़ी बन गई है।

खैर, ये वो है जो हो चुकी। अब वक़्त है आने वाली स्थिति को सुधारने का, सरकार को नये निर्णय लेने का, छोटे से बड़े स्तर तक नये मुहिमों को ढूढ़ने का, पहले खुद को और फिर समाज को जोड़ने का। जो निराश है उन्हें थोड़ी आश देने का, जो अभी चले तक नहीं है उन्हें साथ चलने का, क्योंकि आर्थिक मन्दी से कोई जीना नहीं छोड़ देता, कल के बारें में सोचना नहीं छोड़ देता और आगे बड़ना नहीं छोड़ देता।  

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