इतिहास के कितने रंग होते है। कभी शौर्य से भार हुआ, तो कभी बलिदनों से पर एक रंग वह भी जिसमें विभिन्न प्रकार के जायको का स्वाद है। कुछ ऐसे ही कहानी के संग इतिहास संभाल के गुरुग्राम के सरदार जी जलेबी वाले ने रखा है।
सरदार जी जलेबी वाले की दुकान ओल्ड गुरुग्राम के सदर बाज़ार के बहुत ही व्यस्त चौराहे पर है। इस दुकान के मालिक का नाम जगमोहन सिंह है। वह बाताते है की यह दुकान 1947 से है। भारत के विभाजन के एक महीने पहले से ही है। उस वक़्त यह साधरण-सी दिखने वाली दुकान पकिस्तान के सरगोधा नामक शहर में थी। पकिस्तान से लेकर भारत तक अपने पूरखो की विरासत को जगमोहन जी ने संभाल के रखा है।
यह दुकान पुरानी होने के साथ बहुत प्रसिद्ध है। दूर-दूर से लोग सिर्फ जलेबी खाने सदर बाज़ार आते है। ये बात तो साफ है, अगर दुकान प्रसिद्ध है तो स्वाद भी लाजवाब होगा। लेकिन एक बात है जो सबको पता न हो कि जो जगमोहन जी के बातों में मीठास है वो ही उनकी जलेबी में भी। जलेबी के रंग-रूप की बात करें तो सुनहरे रंग के साथ बाहर से कुरकुरा और अन्दर से बेहद मुलायम है।
दरअसल, महीने के तीसों दिन और आठों पहर इस दुकान में एक जैसी ही भीड़ देखने को मिलती है। साथ ही बड़े-बड़े चूल्हों जलेबी भी बनती रहती है। बहुत ही तरीके से किचन का डिज़ाइन बनाया गया है।
जलेबी की कीमत की बात करू तो अभी 200/किलोग्राम रूपये है। जो की बिल्कुल किफायती लगता है जब स्वाद और दूसरे दुकानों को देखें।
जब स्वाद के साथ कीमत भी अच्छी हो तो ऐसे मे आप गुरुग्राम आयें और सरदार जी की जलेबी ना खाये। ये तो सही नहीं है। तो "आइए खाइए, और गुरुग्राम की मीठास लेकर जाइए"।
जलेबी की कीमत की बात करू तो अभी 200/किलोग्राम रूपये है। जो की बिल्कुल किफायती लगता है जब स्वाद और दूसरे दुकानों को देखें।
जब स्वाद के साथ कीमत भी अच्छी हो तो ऐसे मे आप गुरुग्राम आयें और सरदार जी की जलेबी ना खाये। ये तो सही नहीं है। तो "आइए खाइए, और गुरुग्राम की मीठास लेकर जाइए"।

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