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Sunday, 4 March 2018

कहने को महज़ बात हैं

कहने को बातें महज़ बाते हैं
मैं भी जानती हूं
ये हंसी में छिपे कितने राज हैं
कुछ कही सी कुछ अनकही
न बन के अब रह पाई
हां वो सागर जरूर छूटा है
पर मतलब यह नहीं
कि सागर सूखा है

कहने को महज़ बात है
ये जो चुप रहकर कह जाना था
किसी रिश्ते को बेनाम दे जाना था

कहने को अब होगा नहीं
पर सच पूछो तो
होता ही जा रहा है
वह नाम बेनाम एकनाम
 होता ही जा रहा है


जो कभी खुद के लिए
खड़ी न हो पाती थी
आज समझ लेती
किसी की कई बातें हैं

उसका यूं अब राज छिपाना
ना रास आता है
कहने को महज एक बात है
लेकिन ये बाते अब केवल बात है।।






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