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Saturday, 11 September 2021

समाज में जो बदला नहीं

 "चलो आज कुछ बात करते हैं। समाज में जो बदला नहीं, उसी से शुरुआत करते है।"


लो मान लेते है कि जमाना बदलने के साथ सोच में भी परिवर्तन आ रहा है। लेकिन बदलाव कितना और किस हद तक आया है, क्या किसी ने इसे नापा है? क्या बदलाव को समझने की कोशिश की गई है?

आमतौर पर समझे तो समय बदलता रहता है। नई-नई चीज़े आती रहती है। पहनावे से लेकर टेक्नोलॉजी में अपग्रेड होता रहता है। लेकिन कुछ पैमाने है जिनमें कोई बदलाव नज़र नहीं आता।

जी हाँ, मैं और किसी की नहीं, औरतों की स्थिति की बात कर रही हूं। समय कितना भी क्यूँ ना बदल गया हो, औरतों के काम में कोई चेंज नहीं आया। आज भी औरतों को ही घर का सार काम करना पड़ता है, और बुरी बात ये है कि काम करने के बावजूद उस काम की कोई अहमियत नहीं है। घर के ही लोगों ये कहने के बिल्कुल टाईम नहीं लगते कि काम ही क्या है या करती क्या हो तुम?

जानती हूं, कई लोग मेरी इस सोच से वाकिफ़ नहीं होंगे लेकिन मैंने एक नहीं, दो नहीं बल्कि अनेकों लड़कियों की एक जैसी कहानी सुनी है और देखी भी। सोचने की यह बात है कि क्या मिलजुल के काम नहीं किया जा सकता? और अगर नहीं किया जाता तो, जो काम करता है, कम से कम उसको काम करने का क्रेडिट तो मिले।

सच बोलूं तो, धीरे- धीरे समाज ने जैसे नफरत के एक दरवाजे को खोल दिया है। नफरत किसी इन्सान से नहीं, ना ही पुरुषों से लेकिन उस सोच से जिसे लोग बढ़ावा देते है। यहाँ तक औरतें भी कम नहीं है जो सामज की कुरीति की पहरेदार बनी फिरती है। सिर्फ इस दर से कि लोगों कहेंगें कि , " इसकी माँ ने क्या सिखया है? इसे तो कुछ करना नहीं आता?"

भलें लड़की कितना भी क्यूँ ना पढ़ी हो। चाहे कितना भी कमाती हो। जब तक उसे घर काम नहीं आता, घर को मैनेज करना नहीं आता, उसे बेकर ही माना जाता है। वैसे घुमफिर के बातें हमेशा "डिवीज़न ऑफ़ वर्क" पर जाती है।

आखिर में मैं बस एक सवाल पूछूंगी उन लोगों से जो एक तरफ तो औरतों का बढ़चढ़ कर सपोर्ट करते है। दूसरी तरफ जेंडर के आधार पर ये बताते है कि औरतों को क्या करना चाहिए और क्या नहीं। वो लोगों बस इतना बात दें कि कब वो दोगलपन खत्म कर, एक साइड टिकने का मन बनायेंगे? 

Friday, 10 September 2021

ऑनलाइन मरते है लोग...

 

बातों बातों में लोग अक्सर कह देते है कि मैं मार दूंगी/दूंगा तुझे लेकिन इस बात पर मुझे हँसी-सी आती है। और आये भी क्यूँ ना। भाला आज कल जब सब कोई ऑनलाइन और मिलना तो दूर सामने से सकल देखना भी नसीब नहीं है। तो ऐसे में कोई कैसे मार सकता है।

सच कहूँ तो ऑनलाइन मरते है लोग, बिना मिले, बिना एक दूसरे को देखे और बिना छुए, मरते है लोग। ज़ारा सोचो, अगर कोई इन्सान ऑनलाइन आना बन्द कर दे, पोस्ट करना बन्द कर दे, स्टोरी या स्टेटस ना लगाये। यहाँ तक की अपना सीन (seen) ऑफ़ कर दे, तो क्या वो इन्सान मरा नहीं?

और अब तो ऑनलाइन मरना ना जाने कितनी बड़ी बात हो गई हो। मैं इस सोच के खिलाफ, बिल्कुल भी नहीं हूं, बस थोड़ी हैरान हूं और सोच में भी। इस बात कि सोच में की जहाँ जमाना खुद को ज्यादा से ज्यादा ऑनलाइन करने में और खुद की मौजूदगी बनाने में लगा है, वहाँ सब कुछ छोड़ के अपनी मौजूदगी को मारना कैसा होगा।

माना, मैं ऑनलाइन मरने के बारें बात कर रही हूं। लेकिन जहाँ मरने की बात हो वहाँ जिन्दा रखने की बात भाला क्यूँ ना हो। अक्सर आपने देखा होग कि किसी की जिन्दगी खत्म होने के बाद भी वो जिन्दा रहते है। सिर्फ लोगों यादों में ही नहीं बल्कि एक पेज, हैशटैग और कभी-कभी मूवमेंट के नाम से उन्हें जिन्दा रखा जा सकता है। 

लेकिन कई बार, कई लोग को ये बात रास नहीं आती। मेरे हिसाब से उन लोगों को ये सोचना चाहिए की अगर, हैशटैग और किसी पेज का सहारा लेकर गुज़र गए लोगों को याद नहीं किया जाता। तो शायद उन लाखों लोगों तक पहूंच पाना आसान नहीं होता। जिन लोगों तक ऑनलाइन होने की वजह से मुमकिन हुआ। इसलिए आज ये कहना जरूरी हो जाता है कि किसी भी ऑनलाइन मौत होने से फ़र्क पड़ना चाहिए। 

The Courage to Be Disliked: A Life-Changing Perspective

The stories of the heart are often unheard by another mind or heart. They remain confined to one's own soul. Understanding o...