"चलो आज कुछ बात करते हैं। समाज में जो बदला नहीं, उसी से शुरुआत करते है।"
लो मान लेते है कि जमाना बदलने के साथ सोच में भी परिवर्तन आ रहा है। लेकिन बदलाव कितना और किस हद तक आया है, क्या किसी ने इसे नापा है? क्या बदलाव को समझने की कोशिश की गई है?
आमतौर पर समझे तो समय बदलता रहता है। नई-नई चीज़े आती रहती है। पहनावे से लेकर टेक्नोलॉजी में अपग्रेड होता रहता है। लेकिन कुछ पैमाने है जिनमें कोई बदलाव नज़र नहीं आता।
जी हाँ, मैं और किसी की नहीं, औरतों की स्थिति की बात कर रही हूं। समय कितना भी क्यूँ ना बदल गया हो, औरतों के काम में कोई चेंज नहीं आया। आज भी औरतों को ही घर का सार काम करना पड़ता है, और बुरी बात ये है कि काम करने के बावजूद उस काम की कोई अहमियत नहीं है। घर के ही लोगों ये कहने के बिल्कुल टाईम नहीं लगते कि काम ही क्या है या करती क्या हो तुम?
जानती हूं, कई लोग मेरी इस सोच से वाकिफ़ नहीं होंगे लेकिन मैंने एक नहीं, दो नहीं बल्कि अनेकों लड़कियों की एक जैसी कहानी सुनी है और देखी भी। सोचने की यह बात है कि क्या मिलजुल के काम नहीं किया जा सकता? और अगर नहीं किया जाता तो, जो काम करता है, कम से कम उसको काम करने का क्रेडिट तो मिले।
सच बोलूं तो, धीरे- धीरे समाज ने जैसे नफरत के एक दरवाजे को खोल दिया है। नफरत किसी इन्सान से नहीं, ना ही पुरुषों से लेकिन उस सोच से जिसे लोग बढ़ावा देते है। यहाँ तक औरतें भी कम नहीं है जो सामज की कुरीति की पहरेदार बनी फिरती है। सिर्फ इस दर से कि लोगों कहेंगें कि , " इसकी माँ ने क्या सिखया है? इसे तो कुछ करना नहीं आता?"
भलें लड़की कितना भी क्यूँ ना पढ़ी हो। चाहे कितना भी कमाती हो। जब तक उसे घर काम नहीं आता, घर को मैनेज करना नहीं आता, उसे बेकर ही माना जाता है। वैसे घुमफिर के बातें हमेशा "डिवीज़न ऑफ़ वर्क" पर जाती है।
आखिर में मैं बस एक सवाल पूछूंगी उन लोगों से जो एक तरफ तो औरतों का बढ़चढ़ कर सपोर्ट करते है। दूसरी तरफ जेंडर के आधार पर ये बताते है कि औरतों को क्या करना चाहिए और क्या नहीं। वो लोगों बस इतना बात दें कि कब वो दोगलपन खत्म कर, एक साइड टिकने का मन बनायेंगे?
