इन फांसी के फंदो में ,
और लटके हुए कंधों में ।
हर गली
में, हर
शहरों में ,
भूखों में और नंगो में।
मैनें किसको देखा था,
क्या नाम मैनें सोचा था।
किस धर्म का, किस जाति का,
लोग नाम पूछने को आते है।
क्यों वर्ग अनेक नज़र आ जाते है,
क्यों जातपात के नाम पर,
लोग बाटने को आते है।
नेता से लेकर पाखण्ड तक,
केवल जाति-धर्म का धनधा है।
न मस्जिदो
में, न मंदिरो
में,
मिलता रब का बन्दा है।
लहू-लुहान-सा सब दिखता यहां,
बस दंगा ही दंगा है ।
है सिर कटते ,
है मांग उजड़ती,
न कुछ अब चंगा है।
