जो जीवन वैरागों से भरा,
वो ही त्याग कहलाता है।
मत्सर में फस कर मानव,
गलत राह ही जाता है।
इच्छाओं को न पूरा कर,
विचलित मन हो आता है।
वैरागी बन के मनुष्य,
न इर्षा, द्वेष और मोह,
को गले लगता है।
जब देखों वह केवल,
ईश्वर के गुण गाता है।
लोभ-प्रलोभ में न उलझता,
न ही भोगी दुनिया को,
स्वयं का बताता है।
मत्सर में डूबकर,
जीवन व्यार्थ गवाता है।
वैराग्य से मानवीय बोध,
का रास्ता तैयकर जाता है।
वो ही त्याग कहलाता है।
मत्सर में फस कर मानव,
गलत राह ही जाता है।
इच्छाओं को न पूरा कर,
विचलित मन हो आता है।
वैरागी बन के मनुष्य,
न इर्षा, द्वेष और मोह,
को गले लगता है।
जब देखों वह केवल,
ईश्वर के गुण गाता है।
लोभ-प्रलोभ में न उलझता,
न ही भोगी दुनिया को,
स्वयं का बताता है।
मत्सर में डूबकर,
जीवन व्यार्थ गवाता है।
वैराग्य से मानवीय बोध,
का रास्ता तैयकर जाता है।



