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Monday, 21 December 2020

हिदायत बहुत आसन है....

क्या है सही-गलत? बिना पूरी बात जाने, लोग अपने मतलब के लिए बातों को कैसे बदल देते है। खासकर इस दौर में जब मिसइन्फोर्मेशन, डिसइन्फोर्मेशन और माल-इन्फोर्मेशन आम है। लेकिन आखिर क्या होते है ये? इनसे आपका क्या रिलेशन?


ऐसा समय जब सबके हाथ मे स्मार्ट फोन है और सोशल मीडिया पर सभी ऐक्टिव, तो इन सवालों का जवाब देना जरूरी हो जाता है। तो आइए जानते है इन सवालों के जवाब।

मिसइन्फोर्मेशन उसे गलत इन्फोर्मेशन को कहते है जो गुमराह करने के लिए फैलाई जाती है। डिसइन्फोर्मेशन या विघटन, वो जानकारी है,जो किसी व्यक्ति, सामाजिक समूह, संगठन या देश को नुकसान पहुंचाने के लिए, गलत और जानबूझकर बनाई जाती है। विशेष रूप से जनता की राय को प्रभावित करने या सच्चाई को छिपना के लिए। अक्सर इसे गुप्त रूप से फैलाया जाता है। आखिर में माल-इन्फोर्मेशन या माल-सूचना, यह वास्तविकता पर आधारित जानकारी का उपयोग कर किसी व्यक्ति, संगठन या देश को नुकसान पहुंचाने के लिए किया जाता है।

सन् 2018 में यूनेस्को द्वारा दी गई रिपोर्ट में इन्हीं बातों पर ध्यान दिया गया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से किस तरह गलत जानकारी को लोगों तक पहुँच रही है। यह तक की पत्रकारिता भी इससे अछुती नहीं रह पाई।

कुछ सालों से सभी ने "फके न्यूज़" जैसे शब्दों को बार-बार सुना है और लगातर यह बहस का मुद्दा भी बना रहा है। बात सोचने की है कि विश्वास किस खबर पर करें? कौन-सी न्यूज़ सच्ची है और कौन-सी नहीं ये कैसे जाने? क्या हम भी इसका शिकार हो रहे है और पत्रकारिता का क्या काम इसमें?

देखा जाए तो पत्रकारिता और पत्रकार ही पहला टारगेट होते है इन खबरों का। अगर पत्रकार की समझ विकसित न हो या वह उस विषय से सम्बन्धित जानकारी न रखता हो। 

हालांकि, किसी भी खबर को बिना जाँच के नहीं दिखाया जाता। लेकिन जब खबर को बिना जाँच के दिखाया जाए तो सभी लोगों को वही जानकारी पत्रकार के मध्यम से मिलती है। ऐसी स्थिति में बहुत जरूरी हो जाता है फैक्ट को चेक करना और अपनी विश्वसनीयता को बरकरार रखना। 

खबरों की जाँच करना जरूरी इसलिए भी हो जाता है क्योंकि आज-कल खबरों को बनाना, किसी पत्रकार के नाम या किसी चैनल नाम पर दिखना या छापना आम हो गया है। ऐसे वक़्त में जरूरी हो जाता है यह जानना कि ये किसने बनाया, किसका उदेश्य क्या है और यह किस तरह का कंटेंट है।

साथ-ही साथ रिपोर्ट में अगल-अगल तरह के इन्फॉर्मेशन पहुँचाने वाले एजेंट, मैसेज की अवधि, किसके पास मैसेज पहुँचाना है। आखिरी में उस मैसेज पर लिया गया ऐक्शन। ये किसी भी दिशा में हो सकते है। चाहे सहयोग के लिए हो या विरोध के लिए। ऐसे में क्या करें?

वास्तव में सोशल मीडिया के दौर में यह प्रक्रिया बहुत तेज़ है। हमें याद रखने की जरूरत है की गलत इन्फॉर्मेशन फैलाने वाले कई है लेकिन उनसे भी ज्यादा है कंज़्यूमर यानी की हम। तो कुछ भी शेयर करने से पहले सोचने की जरूरत है। 

तो एक चीज़ देता साथ है। मेरी पास एक ही बात है। हिदायत बहुत आसन है, बस थोड़ा सोचने-समझने का सारा ज्ञान है। 

Saturday, 5 December 2020

आश और संघर्ष

संघर्ष ही जीवन का जब एक मात्र रस्ता बच जाता है तो सोचने-समझने में क्यूँ वक़्त गवाना। आखिर कुछ तो मोल होता है संघर्ष का। चाहे गाँव हो या शहर हर जगह एक चीज़ का सामना करना पड़ता है और वह केवल संघर्ष ही है।

आज पांच साल के गंभीर सूखे के बाद भारी बारिश हुई। गाँव के सभी लोग अपने परिवार के साथ जश्न मनाने लगे। इतनी खुशी बीते पाँच सालों में कहाँ मिल पाई थी। ऐसा लगा रहा मानों सारी खुशियाँ आज किसान की झोली में आ गई हो।

दूसरी ओर जब मैं गाँव की बदली हवा को देखती हूं तो बस देखते रहने का ज़ी करता है। सच मानों तो ये बारिश आज उस संघर्ष की कीमत ही तो चुकाने आयी है। साथ-ही-साथ मौसम के बदलने से सबका मिज़ाज ही बदल गया। चारों तरफ पेड़ झूम रहे है और मिट्टी की खुशबू ने तो बचपन की याद ही दिला दी, जब माँ से छिप-छिप के मिट्टी का सवाद चखा जाता था। उफ्फ़! वो दिन, आज याद आ गये।

खैर, यादें तो यादें ही होती है लेकिन इस याद में वो याद भी शामिल जब गावँ में एक अनाज का दाना न था। खर्चे के लिए भी कर्ज़ लेना पड़ता था। सोचने की बात है, जो किसान पूरे देश का पेट भरता था आज उसी का पेट खाली है।

बीते सालों में गाँव के हालात बद से बतर हो गये थे। एक ओर जहाँ खर्चा चल पाना मुश्किल था तो दूसरी ओर खेत रोती थी और वैसे ही रोते थे छोटे बच्चे। जिनका का बचपना खेल-कूद के साथ तो बिता लेकिन खानपान ले साथ नहीं। कई नवजात बच्चों ने दुनिया में आते ही दम तोड़ दिया। किशोरों की हालत भी ज्यादा अच्छी ना थी बस किसी तरह चल रहा था लेकिन आज इस बारिश ने सभी के मन में आश जग दी। वो आश जो कब का दम तोड़ चुकी थी।

खास कर खुशी तो उस किसान को थी जिसे अपने घर का पेट चलना भी मुश्किल था। ये सारी बातें सोचते-सोचते मेरी नज़र पिताजी पर पड़ी जो खुश होते-होते रोने लगे। वह कभी रोते ना थे, कठोर स्वभाव था उनका थोड़ा, लेकिन इस बारिश ने उन्हें रूला दिया। ऐसे पलों में रोना स्वाभाविक भी है।

ये पल ऐसा है जब खुशी और गम का संगम होता हो, एक लम्बी रात के बाद थोड़ी रौशनी दिखाई दी हो, किस बालक को खिलौना मिल गया हो या किसी बुजुर्ग को अपनों का प्यार, सम्मान, सेवा। ये पल ऐसे ही जो संघर्ष के बाद उम्मीद की रौशनी देखती है।

Friday, 13 November 2020

मेरे कुछ पल के साथी



खत
कानपुर

प्रिय जतिन

क्या सब खत्म हो गया?
बस इतना ही था तेरा साथ, ये रोज़-रोज़ मेरा युं कॉल लगाना और मेरा नाम तेरी स्क्रीन पर देख, कॉल काट देना, थोड़ा बेरुखा है, थोड़ा अजीब भी। है ना!, लेकिन ये एहसास दिलाता है, कि तू आज भी है, गुस्सा सही पर तू आज भी है।

शायद मेरी बातें तुझे घिसी-पिटी लगती होगी, मन मुझसे हट-सा गया होगा इसलिए तो तू मुझसे दूर है, बहुत दूर है। वो कहते है न, फासले कभी कदमों से नहीं नापे जाते, वो तो दिल कि गहराई से आखे जाते है। और रोज़-रोज़ तेरा युं कॉल काट देना, एहसास एक ही चीज़ करता है कि तू आज भी है, गुस्सा सही पर तू आज भी है।

अब सोचती हूं, क्या तू आज भी मेरा हाथ थाम के चलना पसंद करता होगा या मेरे हाथ की जगह कोई और हाथ आ गया होगा। क्या आज भी तुम्हें आलू के पराठे पसंद होंगे, वो भी टमाटर की चटनी के साथ या अपनी पसंद तुमने किस के लिए बदल ली होगी।

अब बस एक ही चीज़ रह-रह सताती है कि नहीं होगी तुम्हारे जहन में मैं या भुला दिया होगा मुझे? हाँ, ये सच है की मैं आज भी तुम्हारे बारे में सोचती हूं लेकिन वो प्यार नहीं। वो तो बस एक पुराना एहसास है जो रह-रह के मेरे जहन में आ जाता है।

तुम्हें तो याद होगा, आखरी के पलों में कहा तो था मैंने "रूक जाओ" पर तुम्हारी ज़िद और आज देखों ना, ये ज़िद किस मोड़ पर ले आई। तुम सोच रहें होगे कि अब ये खत क्यूँ? तो इसलिए कि अब मैं तुम्हारी यादों से अलविदा ले रही हूं, हमेशा के लिए।

ना दोस्ती, ना प्यार और ना ही यादों का सहारा चाहिए इसलिए मैं तुमसे अलविदा कह रही हूं। अलविदा, मेरे कुछ पल के साथी...... अलविदा।

साक्षी

Wednesday, 11 November 2020

कल्पना: बातें खुद से खुद की

 


प्रिय डेयरी,

कितनी बातें है आज कहने को तुम से, क्या चल रहा है मेरे मन में, तो लो कहती हूं।

किसी की मौत पर दुखी होना स्वभाविक है लेकिन क्या कहे गये कटाक्ष शब्द से दिल नहीं दुखता, क्या वह मौत के समान नहीं होती। किसी एक के कारण अपनी सारी खुशियों को बलिदान करना सम्भव नहीं लेकिन आज तक, प्रभात के समीप आने के पश्चात अपना सब कुछ निछावर कर चुकी लेकिन खुश न कर सकी, विश्वास पनप नहीं पाया। कभी-कभी ऐसा लगता है कि मेरी आत्मा मलिन हो गई हो।

अपने दुखः, दर्द और विलाप को किसके सामने प्रकट तक नहीं कर सकती, बस अन्दर ही अन्दर घुटती जा रही हूं। एक क्षण को मेरी आंखों में आसू आ गया। ये कैसा खेल है भगवान का, जिसने मुझे केवल दुख ही दिया है। ह्रदय शुन्य हो जाना चाहती हूं, लेकिन मेरी आंखों की वर्षा रूकती ही नहीं।

मन मेरा न जाने कही खो रहा है, लग रहा है कि मैं समंदर में डूब रही हूं और दूर खड़ा कोई, अपना-सा देख कर खुश हो रहा है।

ये ख्याल भी कितने अजीब होते है जो अपने होते है उसे पराया बना देते है और जो पराया होता है उसे सहोदर, सब यूं ही चलता रहता है। कोई अपनी भावनाओं को प्रकट कर आत्मिक सुख को भोगता है और कोई सुख की भावनाओं में ही अपना समय व्यतीत कर देता है। सच पुछो तो यही है जीवन। हर क्षण जीवन की दिशा बदलती रही है, मानों हमसे कुछ कहना चाह रही है। 

इन्ही बातों को सोच मैंने अपने आसू पोछ दिए और सोचने लगी कि अन्दर ही अन्दर घुटने से कुछ नहीं होगा। मुझे अपनी भावनाओं, दुखः-दर्द से बाहर निकलना होगा और यही शाश्वत सत्य है।

वृजरा

Tuesday, 10 November 2020

वृजरा के नाम प्रभात के खत...



खत: 
बनारस
प्रिय वृजरा,

क्या फर्क पड़ गया?
मेरी बातों का,जिन्हें मैंने नजाने में ही कितनी बार कही थी तुमसे। आखिर जो होना था वो तो, हो ही गया। कहानी एक मोड़ पर आकर खत्म हो ही गयी। रास्तें अलग हो ही गया। ये तो कभी नहीं सोचा था मैंने।

बीते चार सालों में मैंने कभी तुमसे कह नहीं की मैं क्या सोचता हूं तुम्हारे बारे में, हमारे रिश्ते के बारें में लेकिन आज तुमसे सारी बातें दिल खोल के कहने के लिए एक खत लिख रहा हूं।

सच कहू तो हम दोस्त ही भले थे। पर तुम्हरा बार-बार यूं प्रोपॉसे करना और मेरा मना कर देना, शताने लगा था मुझे, उन भोली आंखो में आंसू देख कर एक पल के लिए थम जाता था मैं। तुम्हारी बेशुमार मुहब्बत के आगें, मेरे डर ने दम तोड़ ही दिया। हाँ, मैं डरता था, उस दोस्ती को खोने से, जो तीन साल से बरकरार थी। सब तो था जो एक दोस्ती में होना चाहिए, खुश तो थे हम, लेकिन तुम्हें दोस्ती को दोस्ती बने रहने देना अच्छा ही नहीं लगा। नाराज था शुरूआती दिनों में मैं तुमसे बहुत। आखिर क्यूं ना होता रिश्ते का नाम जो तुमने बदल दिया था।

हाँ, एक वक़्त ऐसा भी आ गया था, जब मैंने तुम्हारे प्यार को क़ुबुल कर लिया था, तभी तो हम साथ थे। लेकिन हाँ बोल देने में और उस हाँ को ज़हन में बसाने में वक़्त लग गया। आज सोचता हूं तो लगता है की वो मेरी सबसे बड़ी गलती थी। काश हम दोस्त ही रहते, ये रिश्ता का नाम ही न बदलता। 

तुम्हें पता है, जब तक मुझे तुमसे प्यार हुआ, तुम काफी बदल चुकी थी। और ये वो समय था जब एक पल के लिए मुझे ऐसा लगा मानो अब सब खत्म हो गया। लेकिन तुम्हारे अटूट विश्वास और मतवाले प्यार ने फिर से तुम्हारे और भी पास ला दिया। शायद तुम्हरा प्यार ही था जो तुमसे दूर नहीं होने देता था।

खैर, ये बातें पुरानी है पर इतने समय से कहने की कोशिश थी और लो आज कह दी। लेकिन आज मन रह-रह कर गंगा को स्मरण करने लगा है, जैसे कुछ मांग रहा हूं मैं उनसे। सच ही तो है मांग ही रहा हूं पर गांग माता से नहीं, उस गांग रूपी स्त्री से जो मेरे मन में विराजमान है। 

तुमने आज तक जो कह मैंने तुम्हारी हर बात मानी है और मेरी एक बात तुम नहीं मान पाई। तुम्हारे कहने पर एक बार मैंने इस रिश्ते का नाम बदला था और आज तुम मेरे कहने पर इस रिश्ते का नाम नहीं बदल सकती। दोस्ती से प्यार का नाम तुमने दिया और प्यार से शादी का नाम क्या नहीं दे सकता मैं। इतना तो तुम समझ ही गयी होगी की मैं ये रिश्ता टूटने नहीं देना चाहता। रास्ते अलग नहीं करना चाहता इसलिए इतने लंबे समय से कहता आ रहा हूं, लेकिन क्या फर्क पड़ गया?

आशा करता हूं, तुम इस खत का जवाब जरूर दोगी।

तुम्हारा 
प्रभात

    

Saturday, 4 July 2020

दिल लुभावना दौर


दिल लुभानेवाले गानों का दौर हर समय बहुत लोगों के ज़हन में फूलों की सुगन्ध कि तरह महकता रहता हैं। बात ही क्या उस समय की जब सब कुछ इतने आसान और खुबसूरत तरीके से कह दिया जाता, मानों कोई चासनी में पड़ी जलेबी को खिला रहा हो। वो गाना तो आपने सुना ही होगा “ इशारों-इशारों में दिल लेने वाले, बता यें हुनर तूने सिखा कहां से”, ऐसे ही मनोरम गीत जिन्हें सुनकर राहत मिलती है, तो कुछ ऐसे जिन्हें सुनकर थिरक उठने का मन करता है। समय के साथ सब कुछ बदल जाता है और लोगों की आदतों में नयापन समाहित होने लगता है। संगीत भी उन्हीं में से एक है।

आज का परिपेक्ष

एक ज़माना था जब लोग “उड़े जब-जब जुल्फ़े तेरी, कवारेंओं का दिल मचले” सुन के मद्होश हो जाया करते थे। इसका एक कारण यह भी था कि इसे पहले पंजाबी भाषा का बॉलीवुड इंडस्ट्री में प्रयोग नहीं होता था। यह वही गाना है जिसपर आप ने अपने माता-पिता को थिरकते देखा होगा। ऐसे ही कई गानों कि श्रृंखला, जिनके तले रहना सुकून देता है, लेकिन आज-कल के सभी बच्चों और युवाओं के आकर्षण का केंद्र अलग ही तरह के गाने है। जो सुनने में तो सरल जान पड़ते है पर अटपटे और अशलिल होते है। अक्सर यह गानें ट्रेंडी वर्ड्स, फैशन और हिप-हॉप कल्चरल के पीछे भागते नज़र आते है। सच पूछा जाए तो लगभग सभी गानों में कोई-न-कोई पैराग्राफ ऐसा होता है जिसके कारण गानों से मन खींचता जाता है।

कुछ टाईम पहले आया गाना शायद आपने सुना होगा जिसकी पंक्तियां कुछ इस तरह है “अच्छी मजा आई, अच्छी मजा आई, तेरी जैसिवों के साथ ऐसा ही होना था” मतलब तो आप समझ सकते है। खैर, देखा जाए तो सभी गाने ऐसे नहीं होते, कुछ बहुत ही प्यारे, भावुकता से परिपूर्ण और संदेशप्रद होते है।

दरअसल, समय के साथ-साथ गानों का स्तर गिरते जा रहा है और इसका केवल एक ही कारण है बेढ़बे शब्द। दूसरी ओर कोई लोगों को इस तरह के गानें प्रभावित करते है और उनके विचार में यह रचनात्मकता के बढ़ते हुए स्वरूप को दिखाता है। अचंभा होता है जब युवाओं, किशोरों और बच्चों को इन गानों को गुनगुनाते सुनती हूं। इससे एक बात साफ हो जाती है कि आज के गाने सरल, ट्रेडिंग व अंग्रेजी लफ़्जों को मिला कर बनने है।

प्रभाव का कारण 

• नया और रचनात्मकता की होड़
• वेस्टर्न कल्चर का प्रभाव
• बदलते संगीत और लोगों कि डिमानड का असर
• सभी प्रकार की भावनाओं को गानों में पिरोना
• सरल माध्यम द्वारा लोगों तक पहुंचना

इन्हीं कारणों से युवाओं को इस तरह के गाने सरल व प्रभावशील लगते है। लेकिन हमें अपनी सोच को बदलकर केवल उन्हीं गानों की डिमान्ड करनी चाहिए जो सुनने योग हो।

ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का उपयोग

ऑनलाइन प्लेटफॉर्म बदलते स्वरूप को दिखाने, सुनने और पूराने को इकट्ठा करने का बेहतर माध्यम सिध्द् हुआ है। चाहे पूराने ग्रंथो से लेकर नए पुस्तकें हो, किसी भी विषयें के बारें में जानकारी हो, शोधपेपर हो या फिर ऑनलाइन कुछ भी खरीदना हो। सब बड़ी आसानी से हो जाता है।उसी तरह पूराने से लेकर नए गानें ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बहुत आसानी से व बहुत ही जल्दी मिल जाते है। 

युवा और संगीत की पंक्तियां

आज-कल का युवा फैशन के नाम पर अच्छी या बुरी चीजों का चयन करने में अक्सर भूलकर देता है। उस प्रकार संगीत को लोग मनोरंजन के लिए सुनते है लेकिन मनोरंजन के नाम पर भदे और अनर्गल शब्दों वाले गानें युवाओं को बहुत भाने लगे है। संगीतकर और युवाओं को न ही ऐसे गाने बनाने चाहिए और न ही सुनने चाहिए। यह ध्यान देने योग है कि लोगों कि रूचि में इतना परिवर्तन क्यों आ रहा है? जिसके कारण लोगों को अंतर नहीं दिखता।



Sunday, 21 June 2020

है परिवर्तन की बात...

है परिवर्तन की बात अगर
तो इतिहास फिर शोर मचाएग
सतयुग-त्रेता-द्वापर से चल के कलयुग में आएगा
एक गूंज लगेगी चारों ओर
फिर दानव वेश बदल कर आएगा
लहू-लुहान होगी भूमि
और हर मानव, त्राहि त्राहि चिलगाए
तब नयी विजय गाथा सुनने 
नारायण धरती पर आएंगे 

है परिवर्तन की बात अगर
तो इतिहास फिर शोर मचाएग
वेदों से लेकर मुगलों तक
हाहाकार फैल जाएगा
विक्षिप्त होगी मानव जाति
और जात-पात का तिरंगा फैहर पायेगा
फिर होगी संस्कृति धूमिल
ना धर्म सॉस ले पाएगा
तब अधर्म को हराने
देव दूत, मानवरुप, धर चले आएंगे

है परिवर्तन की बात अगर
तो इतिहास फिर शोर मचाएग
अंग्रेजो से आज़ादी
ना विभाजन के बल पर पाएगा
चाहे हिंसा हो या अहिंसा
अपने पुत्रों को, ना गुलाम बतायेगा
स्वयं चोटिल होके भी
दुश्मन का सीना चिर के आएगा
बस यूं ही दानव का
समय पर अन्त हो जाएगा

है परिवर्तन की बात अगर
तो इतिहास फिर शोर मचाए
आज़ादी पाकर भी
गरीबों का सर्वस्व खा जाएगा
कभी खून चूस
जमीदारों को मौज़ कराएगा
लेकिन सोच-समझ का दायरा
शिक्षा से खुल जाएगा
और हर बार घर का भेदी, लंक ढ़एगा

है परिवर्तन की बात अगर
तो इतिहास फिर शोर मचाए 
कृषि-ओद्योग-राजनिती
तीनों का परच फहराएगा
लेकिन समय से साथ
फिर घोर अधेरा छाएगा
जीव-जन्तुओं और प्रकृति का नाश
मानव विनाश का कारण बन जाएगा
सदी बदलने पर भी
इतिहास बदल ना पाएगा
तब अनिति से लोहा ले
मानव विजय रथ को पाएगा
है परिवर्तन की बात अगर
तो इतिहास फिर शोर मचाए

Tuesday, 12 May 2020

मदहोश

तू जाम लगा के मदहोश ना हो
मदहोश होके यूं होश ना खो
वायु बन तू बहता चल 
ना मदहोश होके गिरता पड़ 
है मदहोशी का जाम सबसे बड़ा 
समझ ज़रा, ना वक़्त गवा 

औरों की बातों में क्यूं बहक रहा
विष है ये, क्यूं तू इसे अमृत समझ रहा
क्या मदहोशी है इतनी भली?
जो साथ इसके तू बहक रहा 
तू जाम लगा के अब मदहोश ना हो 
मदहोश होके यूं होश ना खो

बरसो की मेहनत को तू ,अब खण्डर बना रहा
खुद को सर्वेश्वर कह 
दुजो को हीन बता रहा
क्या यही मोल है मेहनत का?
जिसे तू मदहोशी में बह रहा
तू जाम लगा के अब मदहोश ना हो
मदहोश होके यूं होश ना खो

बात है मेरी बड़ी जान सी 
अनजान बन, ना होश खो
खोना है तो, उस मदहोशी में खो
जो बलिदान लेकर भी 
दे उसका मोल
तू जाम लगा के अब मदहोश ना हो
मदहोश होके यूं होश ना खो

है मदहोशी वो ही भली
जो सब तीतर-बिखर जाना पर भी
समेटे, तुझे तुझमें ही
तू जाम लगा के अब मदहोश ना हो
मदहोश होके यूं होश ना खो।

Wednesday, 22 April 2020

रचनात्मकता घटना नहीं बल्कि प्रक्रिया है।


 खूबी और खामियों के खेल में इंसान नई-नई चीजें तलाश कर लेता है। समय नहीं लगता सोच के दायर खुलने में, बस नज़रिया और नियत् कि जरूरत होती है। जब इन दोनों का मेल होता है तो रचनात्मकता भरी सोच और भावना के संग रूचिवध तरीके से मनुष्य अपने रूझाने की तरफ़ आकर्षित होता है।

साल्वग्डोर डाली ने कहा था,परफेक्शन की चिंता मत करो। आप वहां तक कभी नहीं पहुंच पाओगे। विन्सेंट वान गाग ने कहा था, अगर आप अपने अंदर एक आवाज़ सुने की- तुम पेंट नहीं कर सकते, तो पेंट करने की हर संभव कोशिश करें और वह आवाज़ अपने आप गायब हो जाएगी। इस तरह के कोट से पता चलता है कि अगर आपने कुछ करने का निश्चय किया है तो उससे घबड़कर भागना नहीं चाहिए और बिना डर, झिझक व फल कि कामना करें बिना काम करते रहना चाहिए। अगर इसी तरह से काम किया जायें तो यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया का रूप ले लेती है।

रूझान एवं प्रोत्साहन

आज-कल किसी भी कार्य को अनोखे व अपडेट तरीके से करे तो लोगों का रूझान आपकी ओर बढ़ता है। सामने वाला इंसान भी उसे करने कि सोचता है। साथ-ही-साथ कार्य करने वाला भी प्रोत्साहित होता है। आप सभी ने अपने जीवन में कभी-न-कभी यह अनुभव जरूर किया होगा कि अगर, आपको, आपके काम के लिए एप्रिसिएट (appreciate) किया जाए तो आप अगली बार उस काम को और अच्छी तरह से कर सकते है।


क्या रचनात्मकता प्रक्रिया है या घटना

इसमें कोई दो राय नहीं है कि रचनात्मकता एक प्रक्रिया है जो निरंतर चलते रहता है। सरल शब्दों में समझा जाए तो रचनात्मकता बुध्दि और कौशला का विकास है जिसका मनोरथ कभी पूरा नहीं होता। आपने अक्सर देखा होगा कि मनुष्य में किसी-न-किसी विषय के बारे में रूचि एवं समझ होती ही है। कई लोगों का कहना है कि रचनात्मकता एक घटना मात्र है लेकिन यह सत्य नहीं। अगर रचना करना केवल घटना होती तो शायद कवि हमेशा नए-नए विषयों पर काव्य नहीं रच रहे होते। फिल्मों कि कहानियां, उसे बनाने का तरीका और फिल्म को परदे पर आने से पहले यह तैय करना कि लोगों को कैसे लुभाया जाए। यह सब रचनात्मकतावादी सोच नहीं तो क्या है?

इसी तरह का उदाहरण फोटोग्राफी, लेखन, चित्रकला, संगीत और नृत्य आदि है। अगर ऐसी ही प्रक्रिया हमेशा चलती रही तो नई-नई चीजें सामने आते रहेंगे। बस जरूरत है समझ विकसित करने और प्रयास करते रहने की।   


The Courage to Be Disliked: A Life-Changing Perspective

The stories of the heart are often unheard by another mind or heart. They remain confined to one's own soul. Understanding o...