शुरूआत एक सवाल से क्योंकि हजारों लाखों बार पुछने पर भी इस सवाल का जवाब मिलता नहीं है। या ये कहना सही होगा कि ये सवाल कभी खत्म होता नहीं है या ये कि इसका जवाब कोई देता नहीं है?
आए दिन न्यजू पेपर, न्यजू चेनल, ऑनलाइन बेवसाइट पर कुछ खबरे यूं आम हो चुकी है जैसे सुबह-शाम का नाशता। आए दिन एसिड से जला के मारने की, काटकर मारने की... ना जाने क्या-क्या... शहर से लेकर गांव तक इतनी हैवानियत बढ़ गई है, जिसका कोई अंत नहीं है। महिलाएं ना घर पर सुरक्षित है ना घर के बाहर। क्या बनता जा रहा है आज का समाज? जहां आगें बढ़ने की, काबिल बनने की बात तो होती है, लेकिन शिष्टाचार और मानवता में कही पीछे छुट जाता है। ऐसे में क्या उम्मीद की जाए भविष्य से?
जहां हो रहें अत्याचार और शोषण का पैरामीटर बढ़ता ही जा रहा है। महिला बाहर तो बाहर अब घर में भी सुरक्षित नहीं है। ऐसे में समय-समय पर महिलाओं को आगें बढ़ाने की बात करने वाले लोगों को रूक के, सोच-समझ के जवाब देने चाहिए कि आखिर कब तक ऐसा चलेगा?
क्यों केवल खबर ही दिखती है...
संवेदना खो रहें इस समाज में एक और बात आम हो चुकी है। लोग कुछ देर के लिए समझते है, भावुक होते है, आक्रोशित होते है, सड़कों पर भी आ जाते है, लेकिन न्याय दूर-दूर तक नहीं। लोग हर लिखी बात को आज कल खबरों की तरह लेने लगें है। एक आज पढ़ी, चार दिन बाद दूसरी, फिर पता चलता है... अरें, आज से पहले फलाना घटना हुई थी, बस पता नहीं था... पर अफसोस इन ख़बरों का सिलसिला खत्म नहीं होता हैं।
काफी दिन बाद दिमाग ये सोचने पर मजबूर है कि, ऐसी खराब सोच आती कहां से हैं? क्या लोगों के अंदर थोड़ी-सी भी मानवता नहीं बची? क्या हवस इतनी बड़ी हो चुकी है कि लोगों के अंदर शर्म-लाज, मान-सम्मान बचा नहीं। बचपन से सिखी-सिखाई तमीज़ लोग क्यों भूल जाते है? साफतौर पर इसका जवाब हां है। अगर हां नहीं होता तो शायद ऐसी घटनाएं भी नहीं होती। लेकिन हो रही है, इसलिए ये कहना गलत नहीं होगा कि जंगली इंसानों ने जंगल राज के सिवा कुछ सिखा नहीं।