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Tuesday, 31 December 2024

The Courage to Be Disliked: A Life-Changing Perspective

The stories of the heart are often unheard by another mind or heart. They remain confined to one's own soul. Understanding oneself is one of the hardest tasks, isn't it? Yet, it is the most important of all, because who we are reflects directly in our relationships—our interpersonal relationships.

I never considered life as a series of moments. Nor did I ever view my life's challenges as problems of interpersonal relationships. But now, I have come to understand and accept this perspective. This realization struck me as I read "The Courage to Be Disliked" by Ichiro Kishimi and Fumitake Koga.

I won't reveal everything about the book here, but I will say this: it has inspired me to learn, accept, and implement its teachings in my life. Reading it made me realize where I need to work on myself. It emphasized why the "separation of tasks" is so crucial and how I can find true happiness.

Implementing these lessons in life is not easy. Accepting that whatever happens to me—whether positive or negative—is my responsibility and a reflection of my own choices is a tough pill to swallow. But it's a truth that I am ready to embrace and act upon.

Building Horizontal Relationships

We live in a society where almost everything is vertical. Bosses have subordinates, and subordinates have their own subordinates. Even in households, there is often someone in charge of making every decision. This creates a dynamic of superiority and inferiority.

As the authors suggest, feelings of inferiority are subjective; inferiority complexes are often used as excuses, and superiority itself is a façade or a lie. What stood out to me most was the idea of living one's own life. The question, "If you are not living your life for yourself, then who will live it for you?" gave me goosebumps.

It also forced me to confront the fact that many people—including myself—spend too much time living to meet others' expectations.

People Are Not Enemies but Comrades

This book taught me to see the good in people, something I had forgotten over time. It helped me view the universe as a community, where life feels simpler and better when we focus on positivity.

Of course, this way of thinking isn’t easy, but it makes it easier to accept ourselves and bring change. One of the key lessons I learned is that just saying positive affirmations isn’t enough. The first step to real change is self-acceptance. From there, everything else starts to fall into place.


The book also explained how to live life like a dance—always in the spotlight, fully present in the moment. It’s about not letting the "dim light" of the past or future distract you.

Dim light may allow you to see everything around, but it takes your focus away from what really matters—the present. Living in the spotlight means enjoying the moment and being completely present.

No matter how much I try, I can’t capture everything about this book in one place. It’s full of ideas that can help anyone reflect and live a more meaningful life.

Friday, 20 December 2024

दूसरों पर दोष लगाती सोच


कलयुग में हर इंसान के अंदर गुण-अवगुण, अच्छाई-बुराई का समावेश होगा, यह शुरू से तय था। लेकिन समय के साथ इनका बढ़ना, और इस बढ़ोतरी का हमारी सोच और व्यवहार पर असर पड़ना, शायद किसी ने नहीं सोचा था। माना जाता है कि कलयुग का अंत करने के लिए भगवान कल्कि आएंगे, पर क्या यह संभव नहीं कि हर इंसान अपने भीतर के कल्कि को जागृत करे? जैसे हमारे भीतर अच्छाई और बुराई का समावेश होता है, वैसे ही बदलाव और सुधार का बीज भी हमारे भीतर हो सकता है।

आज के समाज में, विज्ञान, तकनीक और उद्योगों में तेजी से विकास हो रहा है, पर इस प्रगति के साथ-साथ, मूल मानवीय भावनाएं और नैतिकताएं कहीं पीछे छूटती जा रही हैं। लोग आगे बढ़ने की होड़ में अपने वास्तविक मूल्य और मानवता को भूलते जा रहे हैं। काम तो हो रहा है, लेकिन उसमें निष्पक्षता की कमी है। पक्षपात इस कदर बढ़ गया है कि किसी को सही साबित करने के लिए दूसरे को गलत ठहरा दिया जाता है।

देश के संदर्भ में देखें तो दुश्मन देशों की आलोचना समझ में आती है, लेकिन अगर कोई व्यक्ति अपनी निजी कुढ़न निकालने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अपने ही देश की निंदा करता है, तो यह स्वीकार्य नहीं हो सकता। हर किसी को अपने विचार रखने की आजादी है, लेकिन क्या एक नागरिक का यह कर्तव्य नहीं कि वह अपने देश की प्रतिष्ठा और संप्रभुता का सम्मान करे?

यहां मुद्दा किसी राजनीतिक पार्टी या व्यक्ति विशेष का नहीं है। सवाल यह है कि क्या सही है और क्या गलत? हर इंसान का कुछ न कुछ व्यक्तिगत महत्व होता है, लेकिन समाज और राष्ट्र के स्तर पर भी हमारी कुछ जिम्मेदारियां होती हैं। मानवता के स्तर पर हमारी कुछ भूमिकाएं होती हैं।

आज हमें यह समझने की जरूरत है कि दूसरों पर दोष मढ़ने की बजाय, अपने भीतर झांककर यह देखें कि हम कैसे बेहतर इंसान बन सकते हैं। दोषारोपण से समाधान नहीं निकलता, बल्कि आत्मचिंतन और जिम्मेदारी से ही बदलाव संभव है। क्या हम अपने भीतर के कल्कि को जागृत करने के लिए तैयार हैं?




Sunday, 1 September 2024

मैं हंसती नहीं हूं...

गाँव के सूनेपन में भी किसी को शांति नहीं मिल पाती
और कोई शहर के शोर में भी एकान्त ढूंढ़ लेता है। कुछ ऐसा ही हाल आगे बढ़ते-बढ़ते, जीवन का हो जाता है। शुरुआत में, जब दूसरों को आगे बढ़ता देखते हैं, उन कामों को करते देखते हैं जो कभी सोची थी। तब मन निराश होता हैं। लेकिन लोग वक्त के साथ जीवन जीने की कला भूल जाते है और फिर अचानक से एहसास का तूफान आता हैं, तब मन उदास, दुनियां से निराश और खुद से ख़फ़ा हो कर, हम हंसना ही भूल जाते है।

हंसना जरूरी है, बहुत जरूरी। उतना जरूरी की किसी को हंसते देख ऐसा ना लगे की इतनी हंसी किस बात की। या इसमें कैसी हंसी? किसी को हंसते देख इतना ना सोचना पड़े कि हंसी अच्छी नहीं।

अक्सर खुश रहने का एहसास हंसी से ही आता है। और इसमें कोई कह दें कि तुम हंसते कहाँ हो? तो सोचने की बात है कि आखिर हंसी कहाँ गई? सोचने की बात इतनी हैं कि पढ़ाई खत्म करने के बाद नौकरी लेना, ना मिले तो उसपर उदास होना। उम्र बढ़ने के साथ घर की जिम्मेदारी लेना, अब जिम्मेदारी ली है तो काम के साथ चार बातें भी सुननी होगी। कुछ हो जाए तो बिना किसी से कह सब संभालना होगा, बड़े जो हो गए हैं। कभी रोना आ जाए तो खुद ही चुप करा लेना होगा क्योंकि इतने सालों में खुद को खुद ही संभालने की आदत हो जाती हैं। और अगर कभी गलती से किसी बात पर खुश हुए तो कॉल कर करीबियों को बताने की कोशिश करना लेकिन बात ना हो पाना, ऐसे में फिर कोई पूछें की तुम हंसते क्यों नहीं तो अजीब हैं।

ऐसे में हंसी कम आए तो कोई बड़ी बात नहीं। इंसान ना जाने कितना कुछ सह जाता हैं। नए-नए तरीकों से परेशान होने के बाद भी खुद को आगे बढ़ाते रहना ही बड़ी बात हैं। ये सोचना नहीं कि "मैं क्यों हंसती नहीं" या शायद इससे अहम बात और कोई नहीं।

क्योंकि खुल कर अगर हंसे नहीं तो कैसे जिंदा हैं? जीने का जब एहसास नहीं तो कैसे जिंदा है? और है भी तो क्या खुश है? वो खुशी जो दूसरों को भी खुश कर जाए। वो खुशी जो ग़म में, आसु में भी मुस्कान दे जाए। क्या वैसे खुश हैं? इसलिए शायद हंसी बहुत जरूरी है, ये सोचने से कई ज्यादा कि "मैं हंसती नहीं"।

Thursday, 4 July 2024

कब तक चलेगा?

शुरूआत एक सवाल से क्योंकि हजारों लाखों बार पुछने पर भी इस सवाल का जवाब मिलता नहीं है। या ये कहना सही होगा कि ये सवाल कभी खत्म होता नहीं है या ये कि इसका जवाब कोई देता नहीं है?

आए दिन न्यजू पेपर, न्यजू चेनल, ऑनलाइन बेवसाइट पर कुछ खबरे यूं आम हो चुकी है जैसे सुबह-शाम का नाशता। आए दिन एसिड से जला के मारने की, काटकर मारने की... ना जाने क्या-क्या... शहर से लेकर गांव तक इतनी हैवानियत बढ़ गई है, जिसका कोई अंत नहीं है। महिलाएं ना घर पर सुरक्षित है ना घर के बाहर। क्या बनता जा रहा है आज का समाज? जहां आगें बढ़ने की, काबिल बनने की बात तो होती है, लेकिन शिष्टाचार और मानवता में कही पीछे छुट जाता है। ऐसे में क्या उम्मीद की जाए भविष्य से?

जहां हो रहें अत्याचार और शोषण का पैरामीटर बढ़ता ही जा रहा है। महिला बाहर तो बाहर अब घर में भी सुरक्षित नहीं है। ऐसे में समय-समय पर महिलाओं को आगें बढ़ाने की बात करने वाले लोगों को रूक के, सोच-समझ के जवाब देने चाहिए कि आखिर कब तक ऐसा चलेगा?

क्यों केवल खबर ही दिखती है...

संवेदना खो रहें इस समाज में एक और बात आम हो चुकी है। लोग कुछ देर के लिए समझते है, भावुक होते है, आक्रोशित होते है, सड़कों पर भी आ जाते है, लेकिन न्याय दूर-दूर तक नहीं। लोग हर लिखी बात को आज कल खबरों की तरह लेने लगें है। एक आज पढ़ी, चार दिन बाद दूसरी, फिर पता चलता है... अरें, आज से पहले फलाना घटना हुई थी, बस पता नहीं था... पर अफसोस इन ख़बरों का सिलसिला खत्म नहीं होता हैं।

काफी दिन बाद दिमाग ये सोचने पर मजबूर है कि, ऐसी खराब सोच आती कहां से हैं? क्या लोगों के अंदर थोड़ी-सी भी मानवता नहीं बची? क्या हवस इतनी बड़ी हो चुकी है कि लोगों के अंदर शर्म-लाज, मान-सम्मान बचा नहीं। बचपन से सिखी-सिखाई तमीज़ लोग क्यों भूल जाते है? साफतौर पर इसका जवाब हां है। अगर हां नहीं होता तो शायद ऐसी घटनाएं भी नहीं होती। लेकिन हो रही है, इसलिए ये कहना गलत नहीं होगा कि जंगली इंसानों ने जंगल राज के सिवा कुछ सिखा नहीं।


Saturday, 11 September 2021

समाज में जो बदला नहीं

 "चलो आज कुछ बात करते हैं। समाज में जो बदला नहीं, उसी से शुरुआत करते है।"


लो मान लेते है कि जमाना बदलने के साथ सोच में भी परिवर्तन आ रहा है। लेकिन बदलाव कितना और किस हद तक आया है, क्या किसी ने इसे नापा है? क्या बदलाव को समझने की कोशिश की गई है?

आमतौर पर समझे तो समय बदलता रहता है। नई-नई चीज़े आती रहती है। पहनावे से लेकर टेक्नोलॉजी में अपग्रेड होता रहता है। लेकिन कुछ पैमाने है जिनमें कोई बदलाव नज़र नहीं आता।

जी हाँ, मैं और किसी की नहीं, औरतों की स्थिति की बात कर रही हूं। समय कितना भी क्यूँ ना बदल गया हो, औरतों के काम में कोई चेंज नहीं आया। आज भी औरतों को ही घर का सार काम करना पड़ता है, और बुरी बात ये है कि काम करने के बावजूद उस काम की कोई अहमियत नहीं है। घर के ही लोगों ये कहने के बिल्कुल टाईम नहीं लगते कि काम ही क्या है या करती क्या हो तुम?

जानती हूं, कई लोग मेरी इस सोच से वाकिफ़ नहीं होंगे लेकिन मैंने एक नहीं, दो नहीं बल्कि अनेकों लड़कियों की एक जैसी कहानी सुनी है और देखी भी। सोचने की यह बात है कि क्या मिलजुल के काम नहीं किया जा सकता? और अगर नहीं किया जाता तो, जो काम करता है, कम से कम उसको काम करने का क्रेडिट तो मिले।

सच बोलूं तो, धीरे- धीरे समाज ने जैसे नफरत के एक दरवाजे को खोल दिया है। नफरत किसी इन्सान से नहीं, ना ही पुरुषों से लेकिन उस सोच से जिसे लोग बढ़ावा देते है। यहाँ तक औरतें भी कम नहीं है जो सामज की कुरीति की पहरेदार बनी फिरती है। सिर्फ इस दर से कि लोगों कहेंगें कि , " इसकी माँ ने क्या सिखया है? इसे तो कुछ करना नहीं आता?"

भलें लड़की कितना भी क्यूँ ना पढ़ी हो। चाहे कितना भी कमाती हो। जब तक उसे घर काम नहीं आता, घर को मैनेज करना नहीं आता, उसे बेकर ही माना जाता है। वैसे घुमफिर के बातें हमेशा "डिवीज़न ऑफ़ वर्क" पर जाती है।

आखिर में मैं बस एक सवाल पूछूंगी उन लोगों से जो एक तरफ तो औरतों का बढ़चढ़ कर सपोर्ट करते है। दूसरी तरफ जेंडर के आधार पर ये बताते है कि औरतों को क्या करना चाहिए और क्या नहीं। वो लोगों बस इतना बात दें कि कब वो दोगलपन खत्म कर, एक साइड टिकने का मन बनायेंगे? 

Friday, 10 September 2021

ऑनलाइन मरते है लोग...

 

बातों बातों में लोग अक्सर कह देते है कि मैं मार दूंगी/दूंगा तुझे लेकिन इस बात पर मुझे हँसी-सी आती है। और आये भी क्यूँ ना। भाला आज कल जब सब कोई ऑनलाइन और मिलना तो दूर सामने से सकल देखना भी नसीब नहीं है। तो ऐसे में कोई कैसे मार सकता है।

सच कहूँ तो ऑनलाइन मरते है लोग, बिना मिले, बिना एक दूसरे को देखे और बिना छुए, मरते है लोग। ज़ारा सोचो, अगर कोई इन्सान ऑनलाइन आना बन्द कर दे, पोस्ट करना बन्द कर दे, स्टोरी या स्टेटस ना लगाये। यहाँ तक की अपना सीन (seen) ऑफ़ कर दे, तो क्या वो इन्सान मरा नहीं?

और अब तो ऑनलाइन मरना ना जाने कितनी बड़ी बात हो गई हो। मैं इस सोच के खिलाफ, बिल्कुल भी नहीं हूं, बस थोड़ी हैरान हूं और सोच में भी। इस बात कि सोच में की जहाँ जमाना खुद को ज्यादा से ज्यादा ऑनलाइन करने में और खुद की मौजूदगी बनाने में लगा है, वहाँ सब कुछ छोड़ के अपनी मौजूदगी को मारना कैसा होगा।

माना, मैं ऑनलाइन मरने के बारें बात कर रही हूं। लेकिन जहाँ मरने की बात हो वहाँ जिन्दा रखने की बात भाला क्यूँ ना हो। अक्सर आपने देखा होग कि किसी की जिन्दगी खत्म होने के बाद भी वो जिन्दा रहते है। सिर्फ लोगों यादों में ही नहीं बल्कि एक पेज, हैशटैग और कभी-कभी मूवमेंट के नाम से उन्हें जिन्दा रखा जा सकता है। 

लेकिन कई बार, कई लोग को ये बात रास नहीं आती। मेरे हिसाब से उन लोगों को ये सोचना चाहिए की अगर, हैशटैग और किसी पेज का सहारा लेकर गुज़र गए लोगों को याद नहीं किया जाता। तो शायद उन लाखों लोगों तक पहूंच पाना आसान नहीं होता। जिन लोगों तक ऑनलाइन होने की वजह से मुमकिन हुआ। इसलिए आज ये कहना जरूरी हो जाता है कि किसी भी ऑनलाइन मौत होने से फ़र्क पड़ना चाहिए। 

Sunday, 13 June 2021

इति श्री कर देने के बाद....

सारे दुखः, दर्द और विलप को खुद में समेट लेने के बाद भी, उसका कोई अन्त नहीं। बातों को कितना भी कह दिया जाये लेकिन उनका कोई अन्त नहीं, और हो कैसे? जब असहन वेदना जकड़ के बैठी हो। जिन्दगी बीत जाती है घर-परिवार और अपने लोगों लो संभालने में, खुद के वजूद को एक तरफ कर सवारने में लेकिन उसका कोई मोल नहीं। ऐसे में बातों का अन्त कहाँ से हो।

कुछ ऐसे ही ख्याल आते है मुझे जब मैं प्रतिभा राय की किताब द्रौपदी के बारें में सोचती हूं या पढ़ती हूं। द्रौपदी को मैंने दो बार पढ़ा है सिर्फ इसलिए क्योंकि खो गई थी मैं। लगने लगा था की कोई मेरी बात कर रहा है और ऐसा हर औरत को लगता होगा जब वो इस किताब को पढ़ेगी या जब पढ़ी होगी।

सच कहूँ तो, प्रतिभा राय ने इस किताब को इस तरह से लिखा है जैसे द्रौपदी खुद आपसे बात कर रही हो। द्रौपदी कृषण को पत्र लिख रही होती है और इसकी शुरुआत ही "इति श्री कर देने के बाद लगता है कुछ लिख नहीं पाई" वाक्य से होती है। भला ऐसे वाक्य पर किसका ध्यान नहीं जायेगा।

प्रतिभा राय ने काफ़ी अच्छे शब्दों का इस्तेमाल किया है। भाषा अच्छी और कहानी में अच्छा जोड़ होने के कारण किताब में रुचि बनी रहती है। वैसे पहले, इस किताब को उड़ीया में लिखा गया था। बाद में इसका अनुवाद हिन्दी और इंग्लिश में किया गया। मैंने हिन्दी में अनुवाद की हुई किताब पढ़ी है। मेरे ख्याल से ये किताब सभी को पढ़नी चाहिए। खासकर औरतों को, क्योंकि शायद बहुतों को कुछ-न-कुछ उनसे मिलता हुआ हिस्सा मिल जाये।

Wednesday, 7 April 2021

Dark Alliance to kill the messenger

 

The film tells the story of American investigative journalist Gary Webb, whose controversial story 'Dark Alliance' caught the nation's attention and shook the CIA. It also discloses the consequences Webb had to bear for his pursuit of truth.

The movie starts like a documentary, with a montage of anti-drug sound bites from the 1980s, mixed with archival news footage of the war in Nicaragua. Director Michael Cuesta is perhaps best known for his work on TV series “Homeland” and “Six Feet Under,” and perhaps the worst one can say about his new feature, “Kill the Messenger,” is that it sometimes plays like a condensed version of a first-rate cable miniseries. Based on the life of investigative reporter Gary Webb, who sparked firestorms with his writing on links between the CIA, Nicaraguan Contras and the American crack-cocaine trade only to have his career destroyed in the media blowback, the film taps into far deeper, richer veins of material than it has the time to properly mine. It’s nonetheless a flinty, brainy, continually engrossing work that straddles the lines between biopic, political thriller and journalistic cautionary tale, driven by Jeremy Renner’s most complete performance since “The Hurt Locker.” Specialty box office should be healthy; post-screening debates and Google sessions should be fierce.

Renner plays Webb as a dashing, naturally impatient sort of everyman. (Imagine Robert Redford’s Bob Woodward as a beer-drinking, motorcycle-riding father of three who’s probably been to his fair share of Pearl Jam concerts.) Working for the San Jose Mercury News in the mid-1990s, Webb publishes a piece on seizures of suspected drug dealers’ property by the DEA, only to find a spate of messages from a flirtatious drug trafficker’s call girl ( Paz Vega play that role) waiting for him at his desk the next day.

Meeting up with her, Webb gets hold of a classified record on Danilo Blandon (Yul Vazquez), a former Nicaraguan trafficker with ties to the Contras, enlisted by the DEA to help bring down notorious kingpin “Freeway” Ricky Ross (Michael K. Williams). The document quickly leads Webb down a rabbit hole that sees him travel to Central America, Washington, D.C., South Central L.A. 's crack killing fields, and Ross’ prison cell. Webb receives hints that there might be repercussions for pursuing the story. 

You should watch the struggle that he faced during receiving all the information. And when he posted the article "Dark alliance" on the internet. Its spread rapidly and was arguably one of the first viral news stories — Webb finds himself constantly being asked to defend allegations that he never actually made, his work attracting just as much misinterpretation as condemnation.

It was written by Peter Landesman. It is based on the book "Kill the messenger" by Nick Schou and the book "Dark Alliance" by Gary Webb, which focuses on CIA involvement in Contra cocaine trafficking. Apart from that Jeremy Renner manages to portray the emotional upheaval, passion and anxiety of the late Gary Webb brilliantly. 

Most of the time journalists sacrifice many things for true, job, family and sometimes their own life. This movie give me a sense of difficulty faced by a journalist while investigating the truth. I think it's a nice movie everyone should watch.


Friday, 15 January 2021

सादी दुकान लेकिन स्वाद में हैं जान


इतिहास के कितने रंग होते है। कभी शौर्य से भार हुआ, तो कभी बलिदनों से पर एक रंग वह भी जिसमें विभिन्न प्रकार के जायको का स्वाद है। कुछ ऐसे ही कहानी के संग इतिहास संभाल के गुरुग्राम के सरदार जी जलेबी वाले ने रखा है। 

सरदार जी जलेबी वाले की दुकान ओल्ड गुरुग्राम के सदर बाज़ार के बहुत ही व्यस्त चौराहे पर है। इस दुकान के मालिक का नाम जगमोहन सिंह है। वह बाताते है की यह दुकान 1947 से है। भारत के विभाजन के एक महीने पहले से ही है। उस वक़्त यह साधरण-सी दिखने वाली दुकान पकिस्तान के सरगोधा नामक शहर में थी। पकिस्तान से लेकर भारत तक अपने पूरखो की विरासत को जगमोहन जी ने संभाल के रखा है।

यह दुकान पुरानी होने के साथ बहुत प्रसिद्ध है। दूर-दूर से लोग सिर्फ जलेबी खाने सदर बाज़ार आते है। ये बात तो साफ है, अगर दुकान प्रसिद्ध है तो स्वाद भी लाजवाब होगा। लेकिन एक बात है जो सबको पता न हो कि जो जगमोहन जी के बातों में मीठास है वो ही उनकी जलेबी में भी। जलेबी के रंग-रूप की बात करें तो सुनहरे रंग के साथ बाहर से कुरकुरा और अन्दर से बेहद मुलायम है।

दरअसल, महीने के तीसों दिन और आठों पहर इस दुकान में एक जैसी ही भीड़ देखने को मिलती है। साथ ही बड़े-बड़े चूल्हों जलेबी भी बनती रहती है। बहुत ही तरीके से किचन का डिज़ाइन बनाया गया है।

जलेबी की कीमत की बात करू तो अभी 200/किलोग्राम रूपये है। जो की बिल्कुल किफायती लगता है जब स्वाद और दूसरे दुकानों को देखें।

जब स्वाद के साथ कीमत भी अच्छी हो तो ऐसे मे आप गुरुग्राम आयें और सरदार जी की जलेबी ना खाये। ये तो सही नहीं है। तो "आइए खाइए, और गुरुग्राम की मीठास लेकर जाइए"। 

Tuesday, 5 January 2021

उतार-चढ़ाव की दौड़

माता-पिता के लिए सबसे खुशी का पल वह होता है जब बच्चा अपने पैरों पर खड़ा हो जाये। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है वैसे ही उम्मीद का चिराग जलने लगता है। लेकिन जब कभी उस बच्चे को गहरी चोट लग जाए तो भविष्य निराशा से घिर जाता है। ठीक ऐसी ही स्थिति आज भारत के अर्थव्यवस्था की है।


उस अर्थव्यवस्था कि जो धीरे-धीरे करके आगे बढ़ रहा था। जिसनें कभी पीछे मुड़ना नहीं सिखा, इसलिए तो भारत विकासशील देशों में शामिल है। लेकिन कोरोना के आने से कई सैक्टरों को खासा नुकसान हुआ है।

आज की स्थिति देखती हूं तो इतिहास का एक महत्वपूर्ण चित्र सामने आता है जब भारत को सोने की चिड़िया कह जाता था लेकिन पहले मुगल और फिर अंग्रेजों ने भारत की अर्थव्यवस्था को खोखला किया। हालांकि भारत में गरीबी, भूखमरी, अशिक्षा और स्वास्थ्य से सम्बन्धी समस्याएं रही है लेकिन बीते सालों में इनका भी दर कम मापा गया है। 

इतिहास का एक अभिन्न अंग यह भी है जब भारत में 50% से अधिक कृषि की जाती थी। औद्योगीकरण से लेकर कई सैक्टरों में सेवा, सभी में भारत आगे रहा है। खासकर आईटी सैक्टर के आने से भारत की विश्व बाज़ार में विशेष पहचान बनी है।

दूसरी ओर सन् 1947 से 2020 तक की बात करें तो भारत को 3 बार आर्थिक मन्दी का सामना करना पड़ा। पहला 1991 में, जब अर्थव्यवस्था को काफ़ी नुकसान हुआ था। जिसका मुख्य कारण पेमेंट क्रसिस, इम्पोर्ट में कमी और व्यापार में संतुलन का बिगड़ना था। दूसरी बार अर्थव्यवस्था की लाठी भारत पर ज्यादा जोर से नहीं पड़ी और खुद को एक साल के भीतर निकल लिया। ये बात 2008 की है जब पूरे विश्व को मन्दी का सामना करना पड़ा। तीसरा अब जब कोरोनावायरस की मार सबको झेलनी पड़ी।

देखा जाए तो कोरोना के आने से सभी वर्ग के लोगों को नुकसान हुआ है। बस अन्तर कम-ज्यादा का है। किसी के पास रोटी नहीं तो कोई बीमार है। हाँ, इस वक़्त ने लगभग सभी को महीने खाली बैठाया है। बस अन्तर इतना है कि किसी को तनखाह मिली है और किसी को नहीं। स्कूल-कॉलेज सब बन्द हो गये है। यहाँ तक की लोग डिप्रेशन में जा रहे है।

अर्थव्यवस्था की केवल बात करू तो जीडीपी 4•5% से बढ़के 4•7% हुई थी लेकिन कोरोना के आने 2020 की नोमिनल जीडीपी के लक्ष्य को पूरा कर पाना बहुत मुश्किल है। हालांकि भविष्य में भारत दूसरे देशों के मुताबिक़ खुद को जल्द ही वापस बढ़त की ओर ले जायेगा। किसका कारण यह है कि भारत उपभोग आधारित अर्थव्यवस्था है। जिसकी वजह से भारत को आयात को नियंत्रण कर सकता है। साथ ही लोकल प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल कर खुद को सशक्त कर सकता है।

इस समय भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए "वोचल फ़ॉर लोकल" नाम से सरकार द्वारा अभियान चलाया जा रहा है। जो आज एक अहम कड़ी बन गई है।

खैर, ये वो है जो हो चुकी। अब वक़्त है आने वाली स्थिति को सुधारने का, सरकार को नये निर्णय लेने का, छोटे से बड़े स्तर तक नये मुहिमों को ढूढ़ने का, पहले खुद को और फिर समाज को जोड़ने का। जो निराश है उन्हें थोड़ी आश देने का, जो अभी चले तक नहीं है उन्हें साथ चलने का, क्योंकि आर्थिक मन्दी से कोई जीना नहीं छोड़ देता, कल के बारें में सोचना नहीं छोड़ देता और आगे बड़ना नहीं छोड़ देता।  

Monday, 21 December 2020

हिदायत बहुत आसन है....

क्या है सही-गलत? बिना पूरी बात जाने, लोग अपने मतलब के लिए बातों को कैसे बदल देते है। खासकर इस दौर में जब मिसइन्फोर्मेशन, डिसइन्फोर्मेशन और माल-इन्फोर्मेशन आम है। लेकिन आखिर क्या होते है ये? इनसे आपका क्या रिलेशन?


ऐसा समय जब सबके हाथ मे स्मार्ट फोन है और सोशल मीडिया पर सभी ऐक्टिव, तो इन सवालों का जवाब देना जरूरी हो जाता है। तो आइए जानते है इन सवालों के जवाब।

मिसइन्फोर्मेशन उसे गलत इन्फोर्मेशन को कहते है जो गुमराह करने के लिए फैलाई जाती है। डिसइन्फोर्मेशन या विघटन, वो जानकारी है,जो किसी व्यक्ति, सामाजिक समूह, संगठन या देश को नुकसान पहुंचाने के लिए, गलत और जानबूझकर बनाई जाती है। विशेष रूप से जनता की राय को प्रभावित करने या सच्चाई को छिपना के लिए। अक्सर इसे गुप्त रूप से फैलाया जाता है। आखिर में माल-इन्फोर्मेशन या माल-सूचना, यह वास्तविकता पर आधारित जानकारी का उपयोग कर किसी व्यक्ति, संगठन या देश को नुकसान पहुंचाने के लिए किया जाता है।

सन् 2018 में यूनेस्को द्वारा दी गई रिपोर्ट में इन्हीं बातों पर ध्यान दिया गया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से किस तरह गलत जानकारी को लोगों तक पहुँच रही है। यह तक की पत्रकारिता भी इससे अछुती नहीं रह पाई।

कुछ सालों से सभी ने "फके न्यूज़" जैसे शब्दों को बार-बार सुना है और लगातर यह बहस का मुद्दा भी बना रहा है। बात सोचने की है कि विश्वास किस खबर पर करें? कौन-सी न्यूज़ सच्ची है और कौन-सी नहीं ये कैसे जाने? क्या हम भी इसका शिकार हो रहे है और पत्रकारिता का क्या काम इसमें?

देखा जाए तो पत्रकारिता और पत्रकार ही पहला टारगेट होते है इन खबरों का। अगर पत्रकार की समझ विकसित न हो या वह उस विषय से सम्बन्धित जानकारी न रखता हो। 

हालांकि, किसी भी खबर को बिना जाँच के नहीं दिखाया जाता। लेकिन जब खबर को बिना जाँच के दिखाया जाए तो सभी लोगों को वही जानकारी पत्रकार के मध्यम से मिलती है। ऐसी स्थिति में बहुत जरूरी हो जाता है फैक्ट को चेक करना और अपनी विश्वसनीयता को बरकरार रखना। 

खबरों की जाँच करना जरूरी इसलिए भी हो जाता है क्योंकि आज-कल खबरों को बनाना, किसी पत्रकार के नाम या किसी चैनल नाम पर दिखना या छापना आम हो गया है। ऐसे वक़्त में जरूरी हो जाता है यह जानना कि ये किसने बनाया, किसका उदेश्य क्या है और यह किस तरह का कंटेंट है।

साथ-ही साथ रिपोर्ट में अगल-अगल तरह के इन्फॉर्मेशन पहुँचाने वाले एजेंट, मैसेज की अवधि, किसके पास मैसेज पहुँचाना है। आखिरी में उस मैसेज पर लिया गया ऐक्शन। ये किसी भी दिशा में हो सकते है। चाहे सहयोग के लिए हो या विरोध के लिए। ऐसे में क्या करें?

वास्तव में सोशल मीडिया के दौर में यह प्रक्रिया बहुत तेज़ है। हमें याद रखने की जरूरत है की गलत इन्फॉर्मेशन फैलाने वाले कई है लेकिन उनसे भी ज्यादा है कंज़्यूमर यानी की हम। तो कुछ भी शेयर करने से पहले सोचने की जरूरत है। 

तो एक चीज़ देता साथ है। मेरी पास एक ही बात है। हिदायत बहुत आसन है, बस थोड़ा सोचने-समझने का सारा ज्ञान है। 

The Courage to Be Disliked: A Life-Changing Perspective

The stories of the heart are often unheard by another mind or heart. They remain confined to one's own soul. Understanding o...