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Saturday, 23 September 2017

उम्मीद


"जो उम्मीद  होती थी कभी 
आज वो हुए सच है 
ना उम्मीद करू तो 
मिलता ज़्याद  ही सब कुछ है!!"
 

Monday, 18 September 2017

मन के भाव

  क्यों रुकती है जुबान मेरी ?
बदलो को देख के
ना शीतल हुआ मेरा मन,
चाँद की शीतलता देख के
हवा क्यों है वो चली
जो मन को छुई नहीं
ये द्वन्द्व  है क्यों चला ?
मौसमों को देख के,
लोग भी है यूँ ही
जो लगते है द्वैत से,
भाव है ना जिन में
बदलते वो रंग-रूप
 सत्यता का भाव नहीं
वैरभाव का अभाव हैं,
ये जो संसार है 
अभीप्सा का भण्डार है
रोका अभीप्सा मन में
लोग को देख के
अब कहता मन मेरा
बादलों को देख के
चेतन भाव है क्यों जगा
चाँद को देख के
हवा ये जो चल रही
मन पवित्र कर रही
फिर भी द्वन्द्व है आज भी
पर इसमें किसी का दोष नहीं
बदलती वेला की
कुछ छटा मुझमे छा रही
सयास रहा मन मेरा
करता ये पुकार हैं
लगता अनयासो से बना ये संसार हैं !
इस समयकाल में एक नदी बह रही
भूल के सब कुछ
विश्वास की जोत जग रही ! 

Friday, 8 September 2017

टूटा ख़्वाब


     रोते -रोते  अब आँसू बिसरे
    ना  आँसू बाकी अब बहने को
रोऊ तो अब किस नाम पे
ना नाम है अब कहने को
माना था उस नाम को
जाना था उस नाम को
 क्यों सोचा उस नाम को
   लो खोया मैंने उस नाम को






































































































































































































































































शांति में भी शोर है,
लगता बदलता ये दौर है !!






















The Courage to Be Disliked: A Life-Changing Perspective

The stories of the heart are often unheard by another mind or heart. They remain confined to one's own soul. Understanding o...