साल्वग्डोर डाली ने कहा था,“परफेक्शन की चिंता मत करो। आप वहां तक कभी नहीं पहुंच पाओगे।” विन्सेंट वान गाग ने कहा था, “अगर आप अपने अंदर एक आवाज़ सुने की- तुम पेंट नहीं कर सकते, तो पेंट करने की हर संभव कोशिश करें और वह आवाज़ अपने आप गायब हो जाएगी ”। इस तरह के कोट से पता चलता है कि अगर आपने कुछ करने का निश्चय किया है तो उससे घबड़कर भागना नहीं चाहिए और बिना डर, झिझक व फल कि कामना करें बिना काम करते रहना चाहिए। अगर इसी तरह से काम किया जायें तो यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया का रूप ले लेती है।
रूझान एवं
प्रोत्साहन
आज-कल किसी भी कार्य को अनोखे व
अपडेट तरीके से करे तो लोगों का रूझान आपकी ओर बढ़ता है। सामने वाला इंसान भी उसे
करने कि सोचता है। साथ-ही-साथ कार्य करने वाला भी प्रोत्साहित होता है। आप सभी ने
अपने जीवन में कभी-न-कभी यह अनुभव जरूर किया होगा कि अगर, आपको, आपके काम के लिए
एप्रिसिएट (appreciate) किया
जाए तो आप अगली बार उस काम को और अच्छी तरह से कर सकते है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि
रचनात्मकता एक प्रक्रिया है जो निरंतर चलते रहता है। सरल शब्दों में समझा जाए तो
रचनात्मकता बुध्दि और कौशला का विकास है जिसका मनोरथ कभी पूरा नहीं होता। आपने
अक्सर देखा होगा कि मनुष्य में किसी-न-किसी विषय के बारे में रूचि एवं समझ होती ही
है। कई लोगों का कहना है कि रचनात्मकता एक घटना मात्र है लेकिन यह सत्य नहीं। अगर
रचना करना केवल घटना होती तो शायद कवि हमेशा नए-नए विषयों पर काव्य नहीं रच रहे
होते। फिल्मों कि कहानियां, उसे बनाने का तरीका और फिल्म को परदे पर आने से पहले
यह तैय करना कि लोगों को कैसे लुभाया जाए। यह सब रचनात्मकतावादी सोच नहीं तो क्या
है?
इसी तरह का उदाहरण फोटोग्राफी, लेखन,
चित्रकला, संगीत और नृत्य आदि है। अगर ऐसी ही प्रक्रिया हमेशा चलती रही तो नई-नई
चीजें सामने आते रहेंगे। बस जरूरत है समझ विकसित करने और प्रयास करते रहने की।


