बातों बातों में लोग अक्सर कह देते है कि मैं मार दूंगी/दूंगा तुझे लेकिन इस बात पर मुझे हँसी-सी आती है। और आये भी क्यूँ ना। भाला आज कल जब सब कोई ऑनलाइन और मिलना तो दूर सामने से सकल देखना भी नसीब नहीं है। तो ऐसे में कोई कैसे मार सकता है।
सच कहूँ तो ऑनलाइन मरते है लोग, बिना मिले, बिना एक दूसरे को देखे और बिना छुए, मरते है लोग। ज़ारा सोचो, अगर कोई इन्सान ऑनलाइन आना बन्द कर दे, पोस्ट करना बन्द कर दे, स्टोरी या स्टेटस ना लगाये। यहाँ तक की अपना सीन (seen) ऑफ़ कर दे, तो क्या वो इन्सान मरा नहीं?
और अब तो ऑनलाइन मरना ना जाने कितनी बड़ी बात हो गई हो। मैं इस सोच के खिलाफ, बिल्कुल भी नहीं हूं, बस थोड़ी हैरान हूं और सोच में भी। इस बात कि सोच में की जहाँ जमाना खुद को ज्यादा से ज्यादा ऑनलाइन करने में और खुद की मौजूदगी बनाने में लगा है, वहाँ सब कुछ छोड़ के अपनी मौजूदगी को मारना कैसा होगा।
माना, मैं ऑनलाइन मरने के बारें बात कर रही हूं। लेकिन जहाँ मरने की बात हो वहाँ जिन्दा रखने की बात भाला क्यूँ ना हो। अक्सर आपने देखा होग कि किसी की जिन्दगी खत्म होने के बाद भी वो जिन्दा रहते है। सिर्फ लोगों यादों में ही नहीं बल्कि एक पेज, हैशटैग और कभी-कभी मूवमेंट के नाम से उन्हें जिन्दा रखा जा सकता है।
लेकिन कई बार, कई लोग को ये बात रास नहीं आती। मेरे हिसाब से उन लोगों को ये सोचना चाहिए की अगर, हैशटैग और किसी पेज का सहारा लेकर गुज़र गए लोगों को याद नहीं किया जाता। तो शायद उन लाखों लोगों तक पहूंच पाना आसान नहीं होता। जिन लोगों तक ऑनलाइन होने की वजह से मुमकिन हुआ। इसलिए आज ये कहना जरूरी हो जाता है कि किसी भी ऑनलाइन मौत होने से फ़र्क पड़ना चाहिए।
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