क्या है सही-गलत? बिना पूरी बात जाने, लोग अपने मतलब के लिए बातों को कैसे बदल देते है। खासकर इस दौर में जब मिसइन्फोर्मेशन, डिसइन्फोर्मेशन और माल-इन्फोर्मेशन आम है। लेकिन आखिर क्या होते है ये? इनसे आपका क्या रिलेशन?
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Monday, 21 December 2020
हिदायत बहुत आसन है....
ऐसा समय जब सबके हाथ मे स्मार्ट फोन है और सोशल मीडिया पर सभी ऐक्टिव, तो इन सवालों का जवाब देना जरूरी हो जाता है। तो आइए जानते है इन सवालों के जवाब।
मिसइन्फोर्मेशन उसे गलत इन्फोर्मेशन को कहते है जो गुमराह करने के लिए फैलाई जाती है। डिसइन्फोर्मेशन या विघटन, वो जानकारी है,जो किसी व्यक्ति, सामाजिक समूह, संगठन या देश को नुकसान पहुंचाने के लिए, गलत और जानबूझकर बनाई जाती है। विशेष रूप से जनता की राय को प्रभावित करने या सच्चाई को छिपना के लिए। अक्सर इसे गुप्त रूप से फैलाया जाता है। आखिर में माल-इन्फोर्मेशन या माल-सूचना, यह वास्तविकता पर आधारित जानकारी का उपयोग कर किसी व्यक्ति, संगठन या देश को नुकसान पहुंचाने के लिए किया जाता है।
सन् 2018 में यूनेस्को द्वारा दी गई रिपोर्ट में इन्हीं बातों पर ध्यान दिया गया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से किस तरह गलत जानकारी को लोगों तक पहुँच रही है। यह तक की पत्रकारिता भी इससे अछुती नहीं रह पाई।
कुछ सालों से सभी ने "फके न्यूज़" जैसे शब्दों को बार-बार सुना है और लगातर यह बहस का मुद्दा भी बना रहा है। बात सोचने की है कि विश्वास किस खबर पर करें? कौन-सी न्यूज़ सच्ची है और कौन-सी नहीं ये कैसे जाने? क्या हम भी इसका शिकार हो रहे है और पत्रकारिता का क्या काम इसमें?
देखा जाए तो पत्रकारिता और पत्रकार ही पहला टारगेट होते है इन खबरों का। अगर पत्रकार की समझ विकसित न हो या वह उस विषय से सम्बन्धित जानकारी न रखता हो।
हालांकि, किसी भी खबर को बिना जाँच के नहीं दिखाया जाता। लेकिन जब खबर को बिना जाँच के दिखाया जाए तो सभी लोगों को वही जानकारी पत्रकार के मध्यम से मिलती है। ऐसी स्थिति में बहुत जरूरी हो जाता है फैक्ट को चेक करना और अपनी विश्वसनीयता को बरकरार रखना।
खबरों की जाँच करना जरूरी इसलिए भी हो जाता है क्योंकि आज-कल खबरों को बनाना, किसी पत्रकार के नाम या किसी चैनल नाम पर दिखना या छापना आम हो गया है। ऐसे वक़्त में जरूरी हो जाता है यह जानना कि ये किसने बनाया, किसका उदेश्य क्या है और यह किस तरह का कंटेंट है।
साथ-ही साथ रिपोर्ट में अगल-अगल तरह के इन्फॉर्मेशन पहुँचाने वाले एजेंट, मैसेज की अवधि, किसके पास मैसेज पहुँचाना है। आखिरी में उस मैसेज पर लिया गया ऐक्शन। ये किसी भी दिशा में हो सकते है। चाहे सहयोग के लिए हो या विरोध के लिए। ऐसे में क्या करें?
वास्तव में सोशल मीडिया के दौर में यह प्रक्रिया बहुत तेज़ है। हमें याद रखने की जरूरत है की गलत इन्फॉर्मेशन फैलाने वाले कई है लेकिन उनसे भी ज्यादा है कंज़्यूमर यानी की हम। तो कुछ भी शेयर करने से पहले सोचने की जरूरत है।
तो एक चीज़ देता साथ है। मेरी पास एक ही बात है। हिदायत बहुत आसन है, बस थोड़ा सोचने-समझने का सारा ज्ञान है।
Saturday, 5 December 2020
आश और संघर्ष
संघर्ष ही जीवन का जब एक मात्र रस्ता बच जाता है तो सोचने-समझने में क्यूँ वक़्त गवाना। आखिर कुछ तो मोल होता है संघर्ष का। चाहे गाँव हो या शहर हर जगह एक चीज़ का सामना करना पड़ता है और वह केवल संघर्ष ही है।
आज पांच साल के गंभीर सूखे के बाद भारी बारिश हुई। गाँव के सभी लोग अपने परिवार के साथ जश्न मनाने लगे। इतनी खुशी बीते पाँच सालों में कहाँ मिल पाई थी। ऐसा लगा रहा मानों सारी खुशियाँ आज किसान की झोली में आ गई हो।
दूसरी ओर जब मैं गाँव की बदली हवा को देखती हूं तो बस देखते रहने का ज़ी करता है। सच मानों तो ये बारिश आज उस संघर्ष की कीमत ही तो चुकाने आयी है। साथ-ही-साथ मौसम के बदलने से सबका मिज़ाज ही बदल गया। चारों तरफ पेड़ झूम रहे है और मिट्टी की खुशबू ने तो बचपन की याद ही दिला दी, जब माँ से छिप-छिप के मिट्टी का सवाद चखा जाता था। उफ्फ़! वो दिन, आज याद आ गये।
खैर, यादें तो यादें ही होती है लेकिन इस याद में वो याद भी शामिल जब गावँ में एक अनाज का दाना न था। खर्चे के लिए भी कर्ज़ लेना पड़ता था। सोचने की बात है, जो किसान पूरे देश का पेट भरता था आज उसी का पेट खाली है।
बीते सालों में गाँव के हालात बद से बतर हो गये थे। एक ओर जहाँ खर्चा चल पाना मुश्किल था तो दूसरी ओर खेत रोती थी और वैसे ही रोते थे छोटे बच्चे। जिनका का बचपना खेल-कूद के साथ तो बिता लेकिन खानपान ले साथ नहीं। कई नवजात बच्चों ने दुनिया में आते ही दम तोड़ दिया। किशोरों की हालत भी ज्यादा अच्छी ना थी बस किसी तरह चल रहा था लेकिन आज इस बारिश ने सभी के मन में आश जग दी। वो आश जो कब का दम तोड़ चुकी थी।
खास कर खुशी तो उस किसान को थी जिसे अपने घर का पेट चलना भी मुश्किल था। ये सारी बातें सोचते-सोचते मेरी नज़र पिताजी पर पड़ी जो खुश होते-होते रोने लगे। वह कभी रोते ना थे, कठोर स्वभाव था उनका थोड़ा, लेकिन इस बारिश ने उन्हें रूला दिया। ऐसे पलों में रोना स्वाभाविक भी है।
ये पल ऐसा है जब खुशी और गम का संगम होता हो, एक लम्बी रात के बाद थोड़ी रौशनी दिखाई दी हो, किस बालक को खिलौना मिल गया हो या किसी बुजुर्ग को अपनों का प्यार, सम्मान, सेवा। ये पल ऐसे ही जो संघर्ष के बाद उम्मीद की रौशनी देखती है।
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