दुख, दर्द और
विलाप तीनों ही व्यक्ति की भावनाएं है जिसे अक्सर वो छुपाता है, लेकिन कई बार,
किसी न किसी प्रकार वह दूसरों के समक्ष प्रकट हो ही जाती है। वो कहते है न... जो
सत्य है, जो अंदर के भाव है, वह कभी न कभी समाने आ ही जाती है। कुछ ऐसा ही महसूस
कर रहे होगें, वो लोग जिन्हें बदलती व्यवस्था ने, तकनीक ने और शिक्षा के उस स्तर
ने.... न जाने कितना पीछे छोड़ दिया है।
आज कहने के लिए
तो हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा है लेकिन जब नौकरी और शिक्षा प्राप्त करने की बात
आती है तब अंग्रेजी जानने वाले व्यक्ति और प्राईवेट स्कूलओं का ही दामन थामते है।
सच कहा जाए तो ऐसी व्यवस्था पर खेद और अफसोस व्यक्त करने का मन करता है।
जिस देश में
लगभग 41.1 प्रतिशत लोग हिन्दी बोलते है व लिखना भी जानते है। वहां हिन्दी का साथ
छोड़ना और अंग्रेजी से गठजोड़...शोभनीय नहीं है।
वास्तव में कई
दिग्गज नेताओं ने हिन्दी की ओर ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया है, किन्तु वह
फलीभूत होता दिखाई नहीं दें रहा। हालांकि इन प्रयासों के बाद बहुत लोगों ने आगे
आने की कोशिश की है पर उन लोगों का क्या जिसे इस बदलती व्यवस्था ने पीछे छोड़ दिया
है। जिनके पास केवल दुख, दर्द और विलाप ही करने ही है।

बहुत खुब ऐसे लिखते रहो
ReplyDeletethank you
DeleteThis comment has been removed by the author.
ReplyDelete