कानपुर
प्रिय जतिन
क्या सब खत्म हो गया?
बस इतना ही था तेरा साथ, ये रोज़-रोज़ मेरा युं कॉल लगाना और मेरा नाम तेरी स्क्रीन पर देख, कॉल काट देना, थोड़ा बेरुखा है, थोड़ा अजीब भी। है ना!, लेकिन ये एहसास दिलाता है, कि तू आज भी है, गुस्सा सही पर तू आज भी है।
शायद मेरी बातें तुझे घिसी-पिटी लगती होगी, मन मुझसे हट-सा गया होगा इसलिए तो तू मुझसे दूर है, बहुत दूर है। वो कहते है न, फासले कभी कदमों से नहीं नापे जाते, वो तो दिल कि गहराई से आखे जाते है। और रोज़-रोज़ तेरा युं कॉल काट देना, एहसास एक ही चीज़ करता है कि तू आज भी है, गुस्सा सही पर तू आज भी है।
अब सोचती हूं, क्या तू आज भी मेरा हाथ थाम के चलना पसंद करता होगा या मेरे हाथ की जगह कोई और हाथ आ गया होगा। क्या आज भी तुम्हें आलू के पराठे पसंद होंगे, वो भी टमाटर की चटनी के साथ या अपनी पसंद तुमने किस के लिए बदल ली होगी।
अब बस एक ही चीज़ रह-रह सताती है कि नहीं होगी तुम्हारे जहन में मैं या भुला दिया होगा मुझे? हाँ, ये सच है की मैं आज भी तुम्हारे बारे में सोचती हूं लेकिन वो प्यार नहीं। वो तो बस एक पुराना एहसास है जो रह-रह के मेरे जहन में आ जाता है।
तुम्हें तो याद होगा, आखरी के पलों में कहा तो था मैंने "रूक जाओ" पर तुम्हारी ज़िद और आज देखों ना, ये ज़िद किस मोड़ पर ले आई। तुम सोच रहें होगे कि अब ये खत क्यूँ? तो इसलिए कि अब मैं तुम्हारी यादों से अलविदा ले रही हूं, हमेशा के लिए।
ना दोस्ती, ना प्यार और ना ही यादों का सहारा चाहिए इसलिए मैं तुमसे अलविदा कह रही हूं। अलविदा, मेरे कुछ पल के साथी...... अलविदा।
साक्षी


