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Friday, 13 November 2020

मेरे कुछ पल के साथी



खत
कानपुर

प्रिय जतिन

क्या सब खत्म हो गया?
बस इतना ही था तेरा साथ, ये रोज़-रोज़ मेरा युं कॉल लगाना और मेरा नाम तेरी स्क्रीन पर देख, कॉल काट देना, थोड़ा बेरुखा है, थोड़ा अजीब भी। है ना!, लेकिन ये एहसास दिलाता है, कि तू आज भी है, गुस्सा सही पर तू आज भी है।

शायद मेरी बातें तुझे घिसी-पिटी लगती होगी, मन मुझसे हट-सा गया होगा इसलिए तो तू मुझसे दूर है, बहुत दूर है। वो कहते है न, फासले कभी कदमों से नहीं नापे जाते, वो तो दिल कि गहराई से आखे जाते है। और रोज़-रोज़ तेरा युं कॉल काट देना, एहसास एक ही चीज़ करता है कि तू आज भी है, गुस्सा सही पर तू आज भी है।

अब सोचती हूं, क्या तू आज भी मेरा हाथ थाम के चलना पसंद करता होगा या मेरे हाथ की जगह कोई और हाथ आ गया होगा। क्या आज भी तुम्हें आलू के पराठे पसंद होंगे, वो भी टमाटर की चटनी के साथ या अपनी पसंद तुमने किस के लिए बदल ली होगी।

अब बस एक ही चीज़ रह-रह सताती है कि नहीं होगी तुम्हारे जहन में मैं या भुला दिया होगा मुझे? हाँ, ये सच है की मैं आज भी तुम्हारे बारे में सोचती हूं लेकिन वो प्यार नहीं। वो तो बस एक पुराना एहसास है जो रह-रह के मेरे जहन में आ जाता है।

तुम्हें तो याद होगा, आखरी के पलों में कहा तो था मैंने "रूक जाओ" पर तुम्हारी ज़िद और आज देखों ना, ये ज़िद किस मोड़ पर ले आई। तुम सोच रहें होगे कि अब ये खत क्यूँ? तो इसलिए कि अब मैं तुम्हारी यादों से अलविदा ले रही हूं, हमेशा के लिए।

ना दोस्ती, ना प्यार और ना ही यादों का सहारा चाहिए इसलिए मैं तुमसे अलविदा कह रही हूं। अलविदा, मेरे कुछ पल के साथी...... अलविदा।

साक्षी

Wednesday, 11 November 2020

कल्पना: बातें खुद से खुद की

 


प्रिय डेयरी,

कितनी बातें है आज कहने को तुम से, क्या चल रहा है मेरे मन में, तो लो कहती हूं।

किसी की मौत पर दुखी होना स्वभाविक है लेकिन क्या कहे गये कटाक्ष शब्द से दिल नहीं दुखता, क्या वह मौत के समान नहीं होती। किसी एक के कारण अपनी सारी खुशियों को बलिदान करना सम्भव नहीं लेकिन आज तक, प्रभात के समीप आने के पश्चात अपना सब कुछ निछावर कर चुकी लेकिन खुश न कर सकी, विश्वास पनप नहीं पाया। कभी-कभी ऐसा लगता है कि मेरी आत्मा मलिन हो गई हो।

अपने दुखः, दर्द और विलाप को किसके सामने प्रकट तक नहीं कर सकती, बस अन्दर ही अन्दर घुटती जा रही हूं। एक क्षण को मेरी आंखों में आसू आ गया। ये कैसा खेल है भगवान का, जिसने मुझे केवल दुख ही दिया है। ह्रदय शुन्य हो जाना चाहती हूं, लेकिन मेरी आंखों की वर्षा रूकती ही नहीं।

मन मेरा न जाने कही खो रहा है, लग रहा है कि मैं समंदर में डूब रही हूं और दूर खड़ा कोई, अपना-सा देख कर खुश हो रहा है।

ये ख्याल भी कितने अजीब होते है जो अपने होते है उसे पराया बना देते है और जो पराया होता है उसे सहोदर, सब यूं ही चलता रहता है। कोई अपनी भावनाओं को प्रकट कर आत्मिक सुख को भोगता है और कोई सुख की भावनाओं में ही अपना समय व्यतीत कर देता है। सच पुछो तो यही है जीवन। हर क्षण जीवन की दिशा बदलती रही है, मानों हमसे कुछ कहना चाह रही है। 

इन्ही बातों को सोच मैंने अपने आसू पोछ दिए और सोचने लगी कि अन्दर ही अन्दर घुटने से कुछ नहीं होगा। मुझे अपनी भावनाओं, दुखः-दर्द से बाहर निकलना होगा और यही शाश्वत सत्य है।

वृजरा

Tuesday, 10 November 2020

वृजरा के नाम प्रभात के खत...



खत: 
बनारस
प्रिय वृजरा,

क्या फर्क पड़ गया?
मेरी बातों का,जिन्हें मैंने नजाने में ही कितनी बार कही थी तुमसे। आखिर जो होना था वो तो, हो ही गया। कहानी एक मोड़ पर आकर खत्म हो ही गयी। रास्तें अलग हो ही गया। ये तो कभी नहीं सोचा था मैंने।

बीते चार सालों में मैंने कभी तुमसे कह नहीं की मैं क्या सोचता हूं तुम्हारे बारे में, हमारे रिश्ते के बारें में लेकिन आज तुमसे सारी बातें दिल खोल के कहने के लिए एक खत लिख रहा हूं।

सच कहू तो हम दोस्त ही भले थे। पर तुम्हरा बार-बार यूं प्रोपॉसे करना और मेरा मना कर देना, शताने लगा था मुझे, उन भोली आंखो में आंसू देख कर एक पल के लिए थम जाता था मैं। तुम्हारी बेशुमार मुहब्बत के आगें, मेरे डर ने दम तोड़ ही दिया। हाँ, मैं डरता था, उस दोस्ती को खोने से, जो तीन साल से बरकरार थी। सब तो था जो एक दोस्ती में होना चाहिए, खुश तो थे हम, लेकिन तुम्हें दोस्ती को दोस्ती बने रहने देना अच्छा ही नहीं लगा। नाराज था शुरूआती दिनों में मैं तुमसे बहुत। आखिर क्यूं ना होता रिश्ते का नाम जो तुमने बदल दिया था।

हाँ, एक वक़्त ऐसा भी आ गया था, जब मैंने तुम्हारे प्यार को क़ुबुल कर लिया था, तभी तो हम साथ थे। लेकिन हाँ बोल देने में और उस हाँ को ज़हन में बसाने में वक़्त लग गया। आज सोचता हूं तो लगता है की वो मेरी सबसे बड़ी गलती थी। काश हम दोस्त ही रहते, ये रिश्ता का नाम ही न बदलता। 

तुम्हें पता है, जब तक मुझे तुमसे प्यार हुआ, तुम काफी बदल चुकी थी। और ये वो समय था जब एक पल के लिए मुझे ऐसा लगा मानो अब सब खत्म हो गया। लेकिन तुम्हारे अटूट विश्वास और मतवाले प्यार ने फिर से तुम्हारे और भी पास ला दिया। शायद तुम्हरा प्यार ही था जो तुमसे दूर नहीं होने देता था।

खैर, ये बातें पुरानी है पर इतने समय से कहने की कोशिश थी और लो आज कह दी। लेकिन आज मन रह-रह कर गंगा को स्मरण करने लगा है, जैसे कुछ मांग रहा हूं मैं उनसे। सच ही तो है मांग ही रहा हूं पर गांग माता से नहीं, उस गांग रूपी स्त्री से जो मेरे मन में विराजमान है। 

तुमने आज तक जो कह मैंने तुम्हारी हर बात मानी है और मेरी एक बात तुम नहीं मान पाई। तुम्हारे कहने पर एक बार मैंने इस रिश्ते का नाम बदला था और आज तुम मेरे कहने पर इस रिश्ते का नाम नहीं बदल सकती। दोस्ती से प्यार का नाम तुमने दिया और प्यार से शादी का नाम क्या नहीं दे सकता मैं। इतना तो तुम समझ ही गयी होगी की मैं ये रिश्ता टूटने नहीं देना चाहता। रास्ते अलग नहीं करना चाहता इसलिए इतने लंबे समय से कहता आ रहा हूं, लेकिन क्या फर्क पड़ गया?

आशा करता हूं, तुम इस खत का जवाब जरूर दोगी।

तुम्हारा 
प्रभात

    

The Courage to Be Disliked: A Life-Changing Perspective

The stories of the heart are often unheard by another mind or heart. They remain confined to one's own soul. Understanding o...