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Sunday, 10 November 2019

दूधिया रौशनी में डूबी साइबर सिटी की एक शाम

जगमग करता साइबर सिटी गुरूग्राम का ऐसा अंग है जिसके न होने से गुरूग्राम अधूरा हो जाए। यह ऐसी जगह है जिसके बारें में व्यखयाण करने की कवायद नहीं है। वैसे इसे डीएलएफ इलाका के नाम से भी जाना जाता है। यहां कि शाम की आबों हवा लोगों का मन मोह लेती है। सचे मायने यह बेहद खुबसूरत व तारों की तरह चमचमता शहर का एक अभिन्न अंग है।
पॉश इलाका होने के कारण यहां बड़ी-बड़ी बिल्डिंग, रेस्टोरेंट और कई क्लब मौजूद है। लोग अक्सर यहां मौज-मस्ती के लिए आते है। यह क्षेत्र सबके आकर्षण का केंद्र है,खासकर युवा साजौ-सजा को देख आकर्षित होते है।
जब भी कोई गुरूग्राम आता है चाहे वो देशी हो या विदेशी यहां की चकाचौंध और भीड़-भाड़ के खो जाता है। यह जगह केवल अपनी खुबसूरती के लिए ही महशूर नहीं है बल्कि खुशियों को बाटने और जागुरूकता फैलाने जैसे महत्वपूर्ण कार्य भी करता रहता है।
साइबर सिटी ने इतने सालों में लोगों के मन में जरूरी हिस्सा बन गया है जिसे दिल-दिमाग से निकलना बेहद मुश्किल है।

हां.. मैं हिन्दी हूं


दुख, दर्द और विलाप तीनों ही व्यक्ति की भावनाएं है जिसे अक्सर वो छुपाता है, लेकिन कई बार, किसी न किसी प्रकार वह दूसरों के समक्ष प्रकट हो ही जाती है। वो कहते है न... जो सत्य है, जो अंदर के भाव है, वह कभी न कभी समाने आ ही जाती है। कुछ ऐसा ही महसूस कर रहे होगें, वो लोग जिन्हें बदलती व्यवस्था ने, तकनीक ने और शिक्षा के उस स्तर ने.... न जाने कितना पीछे छोड़ दिया है।
आज कहने के लिए तो हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा है लेकिन जब नौकरी और शिक्षा प्राप्त करने की बात आती है तब अंग्रेजी जानने वाले व्यक्ति और प्राईवेट स्कूलओं का ही दामन थामते है। सच कहा जाए तो ऐसी व्यवस्था पर खेद और अफसोस व्यक्त करने का मन करता है।
जिस देश में लगभग 41.1 प्रतिशत लोग हिन्दी बोलते है व लिखना भी जानते है। वहां हिन्दी का साथ छोड़ना और अंग्रेजी से गठजोड़...शोभनीय नहीं है।
वास्तव में कई दिग्गज नेताओं ने हिन्दी की ओर ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया है, किन्तु वह फलीभूत होता दिखाई नहीं दें रहा। हालांकि इन प्रयासों के बाद बहुत लोगों ने आगे आने की कोशिश की है पर उन लोगों का क्या जिसे इस बदलती व्यवस्था ने पीछे छोड़ दिया है। जिनके पास केवल दुख, दर्द और विलाप ही करने ही है।  

Friday, 1 November 2019

खोखली किस्मत


सोच उस बुनियादी ढांचे का 
या कैद मखमली यादाओं का 
जकड़ गई दुनिया मेरी
बस यही किया तुमने तैय रास्ता ?

बात मैं बता दूं तुम्हे 
ये दुनिया मुझे खाने चली 
नोच- नोच के बोटी मेरी 
फिर मुझे सजाने चली 

कल कोई और था 
तो आज कोई और है 
हाय ! किस्मत मेरी 
मिलता मुझे इसका का मोल है 

कहुँ मैं अब और क्या 
ज़िंदगी मेरी ख़ाक-सी 
दर्द में ही उलझी 
कहानी रात से ही रात की 

इतना सुना, तो सुनो एक और बात 
जमाने ने मुझे कई नाम दिए 
लेकिन आज तक, मेरे नाम बेनाम ही 

Sunday, 3 February 2019

कौन किसका यहाँ...


कौन किसका यहाँ,
इस संसार में ।
जब क्रोध नाप के चले,
मनुष्य बाजार में।।
सब बिक जाता यहाँ,
वासनारूपी जाल में।
हो रह क्यों यह अनर्थ,
इस व्यपार में।।
हो कामना प्रबल अगर,
विवेक को तु थाम ले।
हाथ जोड़ के तु,
ईश्वर का नाम ले।।
फिर डर किसका है तुझे,
यह संघर्ष भी तेरा है।
कर्म जो तु करता गया,
उसी में सुख-दुख का बसेरा है।।


The Courage to Be Disliked: A Life-Changing Perspective

The stories of the heart are often unheard by another mind or heart. They remain confined to one's own soul. Understanding o...