गाँव के सूनेपन में भी किसी को शांति नहीं मिल पाती
और कोई शहर के शोर में भी एकान्त ढूंढ़ लेता है। कुछ ऐसा ही हाल आगे बढ़ते-बढ़ते, जीवन का हो जाता है। शुरुआत में, जब दूसरों को आगे बढ़ता देखते हैं, उन कामों को करते देखते हैं जो कभी सोची थी। तब मन निराश होता हैं। लेकिन लोग वक्त के साथ जीवन जीने की कला भूल जाते है और फिर अचानक से एहसास का तूफान आता हैं, तब मन उदास, दुनियां से निराश और खुद से ख़फ़ा हो कर, हम हंसना ही भूल जाते है।
हंसना जरूरी है, बहुत जरूरी। उतना जरूरी की किसी को हंसते देख ऐसा ना लगे की इतनी हंसी किस बात की। या इसमें कैसी हंसी? किसी को हंसते देख इतना ना सोचना पड़े कि हंसी अच्छी नहीं।
अक्सर खुश रहने का एहसास हंसी से ही आता है। और इसमें कोई कह दें कि तुम हंसते कहाँ हो? तो सोचने की बात है कि आखिर हंसी कहाँ गई? सोचने की बात इतनी हैं कि पढ़ाई खत्म करने के बाद नौकरी लेना, ना मिले तो उसपर उदास होना। उम्र बढ़ने के साथ घर की जिम्मेदारी लेना, अब जिम्मेदारी ली है तो काम के साथ चार बातें भी सुननी होगी। कुछ हो जाए तो बिना किसी से कह सब संभालना होगा, बड़े जो हो गए हैं। कभी रोना आ जाए तो खुद ही चुप करा लेना होगा क्योंकि इतने सालों में खुद को खुद ही संभालने की आदत हो जाती हैं। और अगर कभी गलती से किसी बात पर खुश हुए तो कॉल कर करीबियों को बताने की कोशिश करना लेकिन बात ना हो पाना, ऐसे में फिर कोई पूछें की तुम हंसते क्यों नहीं तो अजीब हैं।
ऐसे में हंसी कम आए तो कोई बड़ी बात नहीं। इंसान ना जाने कितना कुछ सह जाता हैं। नए-नए तरीकों से परेशान होने के बाद भी खुद को आगे बढ़ाते रहना ही बड़ी बात हैं। ये सोचना नहीं कि "मैं क्यों हंसती नहीं" या शायद इससे अहम बात और कोई नहीं।
क्योंकि खुल कर अगर हंसे नहीं तो कैसे जिंदा हैं? जीने का जब एहसास नहीं तो कैसे जिंदा है? और है भी तो क्या खुश है? वो खुशी जो दूसरों को भी खुश कर जाए। वो खुशी जो ग़म में, आसु में भी मुस्कान दे जाए। क्या वैसे खुश हैं? इसलिए शायद हंसी बहुत जरूरी है, ये सोचने से कई ज्यादा कि "मैं हंसती नहीं"।