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Tuesday, 10 November 2020

वृजरा के नाम प्रभात के खत...



खत: 
बनारस
प्रिय वृजरा,

क्या फर्क पड़ गया?
मेरी बातों का,जिन्हें मैंने नजाने में ही कितनी बार कही थी तुमसे। आखिर जो होना था वो तो, हो ही गया। कहानी एक मोड़ पर आकर खत्म हो ही गयी। रास्तें अलग हो ही गया। ये तो कभी नहीं सोचा था मैंने।

बीते चार सालों में मैंने कभी तुमसे कह नहीं की मैं क्या सोचता हूं तुम्हारे बारे में, हमारे रिश्ते के बारें में लेकिन आज तुमसे सारी बातें दिल खोल के कहने के लिए एक खत लिख रहा हूं।

सच कहू तो हम दोस्त ही भले थे। पर तुम्हरा बार-बार यूं प्रोपॉसे करना और मेरा मना कर देना, शताने लगा था मुझे, उन भोली आंखो में आंसू देख कर एक पल के लिए थम जाता था मैं। तुम्हारी बेशुमार मुहब्बत के आगें, मेरे डर ने दम तोड़ ही दिया। हाँ, मैं डरता था, उस दोस्ती को खोने से, जो तीन साल से बरकरार थी। सब तो था जो एक दोस्ती में होना चाहिए, खुश तो थे हम, लेकिन तुम्हें दोस्ती को दोस्ती बने रहने देना अच्छा ही नहीं लगा। नाराज था शुरूआती दिनों में मैं तुमसे बहुत। आखिर क्यूं ना होता रिश्ते का नाम जो तुमने बदल दिया था।

हाँ, एक वक़्त ऐसा भी आ गया था, जब मैंने तुम्हारे प्यार को क़ुबुल कर लिया था, तभी तो हम साथ थे। लेकिन हाँ बोल देने में और उस हाँ को ज़हन में बसाने में वक़्त लग गया। आज सोचता हूं तो लगता है की वो मेरी सबसे बड़ी गलती थी। काश हम दोस्त ही रहते, ये रिश्ता का नाम ही न बदलता। 

तुम्हें पता है, जब तक मुझे तुमसे प्यार हुआ, तुम काफी बदल चुकी थी। और ये वो समय था जब एक पल के लिए मुझे ऐसा लगा मानो अब सब खत्म हो गया। लेकिन तुम्हारे अटूट विश्वास और मतवाले प्यार ने फिर से तुम्हारे और भी पास ला दिया। शायद तुम्हरा प्यार ही था जो तुमसे दूर नहीं होने देता था।

खैर, ये बातें पुरानी है पर इतने समय से कहने की कोशिश थी और लो आज कह दी। लेकिन आज मन रह-रह कर गंगा को स्मरण करने लगा है, जैसे कुछ मांग रहा हूं मैं उनसे। सच ही तो है मांग ही रहा हूं पर गांग माता से नहीं, उस गांग रूपी स्त्री से जो मेरे मन में विराजमान है। 

तुमने आज तक जो कह मैंने तुम्हारी हर बात मानी है और मेरी एक बात तुम नहीं मान पाई। तुम्हारे कहने पर एक बार मैंने इस रिश्ते का नाम बदला था और आज तुम मेरे कहने पर इस रिश्ते का नाम नहीं बदल सकती। दोस्ती से प्यार का नाम तुमने दिया और प्यार से शादी का नाम क्या नहीं दे सकता मैं। इतना तो तुम समझ ही गयी होगी की मैं ये रिश्ता टूटने नहीं देना चाहता। रास्ते अलग नहीं करना चाहता इसलिए इतने लंबे समय से कहता आ रहा हूं, लेकिन क्या फर्क पड़ गया?

आशा करता हूं, तुम इस खत का जवाब जरूर दोगी।

तुम्हारा 
प्रभात

    

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