प्रिय डेयरी,
कितनी बातें है आज कहने को तुम से, क्या चल रहा है मेरे मन में, तो लो कहती हूं।
किसी की मौत पर दुखी होना स्वभाविक है लेकिन क्या कहे गये कटाक्ष शब्द से दिल नहीं दुखता, क्या वह मौत के समान नहीं होती। किसी एक के कारण अपनी सारी खुशियों को बलिदान करना सम्भव नहीं लेकिन आज तक, प्रभात के समीप आने के पश्चात अपना सब कुछ निछावर कर चुकी लेकिन खुश न कर सकी, विश्वास पनप नहीं पाया। कभी-कभी ऐसा लगता है कि मेरी आत्मा मलिन हो गई हो।अपने दुखः, दर्द और विलाप को किसके सामने प्रकट तक नहीं कर सकती, बस अन्दर ही अन्दर घुटती जा रही हूं। एक क्षण को मेरी आंखों में आसू आ गया। ये कैसा खेल है भगवान का, जिसने मुझे केवल दुख ही दिया है। ह्रदय शुन्य हो जाना चाहती हूं, लेकिन मेरी आंखों की वर्षा रूकती ही नहीं।
मन मेरा न जाने कही खो रहा है, लग रहा है कि मैं समंदर में डूब रही हूं और दूर खड़ा कोई, अपना-सा देख कर खुश हो रहा है।
ये ख्याल भी कितने अजीब होते है जो अपने होते है उसे पराया बना देते है और जो पराया होता है उसे सहोदर, सब यूं ही चलता रहता है। कोई अपनी भावनाओं को प्रकट कर आत्मिक सुख को भोगता है और कोई सुख की भावनाओं में ही अपना समय व्यतीत कर देता है। सच पुछो तो यही है जीवन। हर क्षण जीवन की दिशा बदलती रही है, मानों हमसे कुछ कहना चाह रही है।
इन्ही बातों को सोच मैंने अपने आसू पोछ दिए और सोचने लगी कि अन्दर ही अन्दर घुटने से कुछ नहीं होगा। मुझे अपनी भावनाओं, दुखः-दर्द से बाहर निकलना होगा और यही शाश्वत सत्य है।
वृजरा

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