कौन किसका यहाँ,
इस संसार में ।
जब क्रोध नाप के चले,
मनुष्य बाजार में।।
सब बिक जाता यहाँ,
वासनारूपी जाल में।
हो रह क्यों यह अनर्थ,
इस व्यपार में।।
हो कामना प्रबल अगर,
विवेक को तु थाम ले।
हाथ जोड़ के तु,
ईश्वर का नाम ले।।
फिर डर किसका है तुझे,
यह संघर्ष भी तेरा है।
कर्म जो तु करता गया,
उसी में सुख-दुख का बसेरा है।।

No comments:
Post a Comment