कलयुग में हर इंसान के अंदर गुण-अवगुण, अच्छाई-बुराई का समावेश होगा, यह शुरू से तय था। लेकिन समय के साथ इनका बढ़ना, और इस बढ़ोतरी का हमारी सोच और व्यवहार पर असर पड़ना, शायद किसी ने नहीं सोचा था। माना जाता है कि कलयुग का अंत करने के लिए भगवान कल्कि आएंगे, पर क्या यह संभव नहीं कि हर इंसान अपने भीतर के कल्कि को जागृत करे? जैसे हमारे भीतर अच्छाई और बुराई का समावेश होता है, वैसे ही बदलाव और सुधार का बीज भी हमारे भीतर हो सकता है।
आज के समाज में, विज्ञान, तकनीक और उद्योगों में तेजी से विकास हो रहा है, पर इस प्रगति के साथ-साथ, मूल मानवीय भावनाएं और नैतिकताएं कहीं पीछे छूटती जा रही हैं। लोग आगे बढ़ने की होड़ में अपने वास्तविक मूल्य और मानवता को भूलते जा रहे हैं। काम तो हो रहा है, लेकिन उसमें निष्पक्षता की कमी है। पक्षपात इस कदर बढ़ गया है कि किसी को सही साबित करने के लिए दूसरे को गलत ठहरा दिया जाता है।
देश के संदर्भ में देखें तो दुश्मन देशों की आलोचना समझ में आती है, लेकिन अगर कोई व्यक्ति अपनी निजी कुढ़न निकालने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अपने ही देश की निंदा करता है, तो यह स्वीकार्य नहीं हो सकता। हर किसी को अपने विचार रखने की आजादी है, लेकिन क्या एक नागरिक का यह कर्तव्य नहीं कि वह अपने देश की प्रतिष्ठा और संप्रभुता का सम्मान करे?
यहां मुद्दा किसी राजनीतिक पार्टी या व्यक्ति विशेष का नहीं है। सवाल यह है कि क्या सही है और क्या गलत? हर इंसान का कुछ न कुछ व्यक्तिगत महत्व होता है, लेकिन समाज और राष्ट्र के स्तर पर भी हमारी कुछ जिम्मेदारियां होती हैं। मानवता के स्तर पर हमारी कुछ भूमिकाएं होती हैं।
आज हमें यह समझने की जरूरत है कि दूसरों पर दोष मढ़ने की बजाय, अपने भीतर झांककर यह देखें कि हम कैसे बेहतर इंसान बन सकते हैं। दोषारोपण से समाधान नहीं निकलता, बल्कि आत्मचिंतन और जिम्मेदारी से ही बदलाव संभव है। क्या हम अपने भीतर के कल्कि को जागृत करने के लिए तैयार हैं?
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