सारे दुखः, दर्द और विलप को खुद में समेट लेने के बाद भी, उसका कोई अन्त नहीं। बातों को कितना भी कह दिया जाये लेकिन उनका कोई अन्त नहीं, और हो कैसे? जब असहन वेदना जकड़ के बैठी हो। जिन्दगी बीत जाती है घर-परिवार और अपने लोगों लो संभालने में, खुद के वजूद को एक तरफ कर सवारने में लेकिन उसका कोई मोल नहीं। ऐसे में बातों का अन्त कहाँ से हो।
कुछ ऐसे ही ख्याल आते है मुझे जब मैं प्रतिभा राय की किताब द्रौपदी के बारें में सोचती हूं या पढ़ती हूं। द्रौपदी को मैंने दो बार पढ़ा है सिर्फ इसलिए क्योंकि खो गई थी मैं। लगने लगा था की कोई मेरी बात कर रहा है और ऐसा हर औरत को लगता होगा जब वो इस किताब को पढ़ेगी या जब पढ़ी होगी।
सच कहूँ तो, प्रतिभा राय ने इस किताब को इस तरह से लिखा है जैसे द्रौपदी खुद आपसे बात कर रही हो। द्रौपदी कृषण को पत्र लिख रही होती है और इसकी शुरुआत ही "इति श्री कर देने के बाद लगता है कुछ लिख नहीं पाई" वाक्य से होती है। भला ऐसे वाक्य पर किसका ध्यान नहीं जायेगा।
प्रतिभा राय ने काफ़ी अच्छे शब्दों का इस्तेमाल किया है। भाषा अच्छी और कहानी में अच्छा जोड़ होने के कारण किताब में रुचि बनी रहती है। वैसे पहले, इस किताब को उड़ीया में लिखा गया था। बाद में इसका अनुवाद हिन्दी और इंग्लिश में किया गया। मैंने हिन्दी में अनुवाद की हुई किताब पढ़ी है। मेरे ख्याल से ये किताब सभी को पढ़नी चाहिए। खासकर औरतों को, क्योंकि शायद बहुतों को कुछ-न-कुछ उनसे मिलता हुआ हिस्सा मिल जाये।

👌👌
ReplyDeleteThank you🙂😊
Delete❣️❣️
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