क्यों रुकती है जुबान मेरी ?
बदलो को देख के
ना शीतल हुआ मेरा मन,
चाँद की शीतलता देख के
हवा क्यों है वो चली
जो मन को छुई नहीं
ये द्वन्द्व है क्यों चला ?
मौसमों को देख के,
लोग भी है यूँ ही
जो लगते है द्वैत से,
भाव है ना जिन में
बदलते वो रंग-रूप
सत्यता का भाव नहीं
वैरभाव का अभाव हैं,
ये जो संसार है
अभीप्सा का भण्डार है
रोका अभीप्सा मन में
लोग को देख के
अब कहता मन मेरा
बादलों को देख के
चेतन भाव है क्यों जगा
चाँद को देख के
हवा ये जो चल रही
मन पवित्र कर रही
फिर भी द्वन्द्व है आज भी
पर इसमें किसी का दोष नहीं
बदलती वेला की
कुछ छटा मुझमे छा रही
सयास रहा मन मेरा
करता ये पुकार हैं
लगता अनयासो से बना ये संसार हैं !
इस समयकाल में एक नदी बह रही
भूल के सब कुछ
विश्वास की जोत जग रही !

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